विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभरमें बहुतोंको सफाया कर गया।—इसी प्रकार उपाय करते अपाय हुआ करता है। कलिमें राम-नामके सिवा अन्यान्य उपाय ऐसे ही हैं। २—'मरत......धरनि'—काशीकी महिमाके सम्बन्धमें निम्नलिखित व्याज-स्तुति देखिये:— एक दिएँ जहाँ कोटिक होत हैं सो कुरु खेत मैं जाइ अन्हाइय । तीरथ राज प्रयाग बड़े मन-वांछितके फल पाइ अघाइय ॥ श्री मथुरा बसि 'केसवदासजू' द्वै भुज तें भुज चार है जाइय । कासी पुरीकी कुरीति बुरी जहाँ देह दिएँ पुनि देह न पाइय ॥ —केशवदास (द्वितीय) [१८५] लाज न लागत दास कहावत । सो आचरन बिसारि सोच तजि, जो हरि तुम कहँ भावत ॥१॥ सकल सङ्ग तजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग बनावत । मो-सम मन्द महाखल पाँवर, कौन जतन तेहि पावत ॥२॥ हरि निरमल, मलग्रसित हृदय, असमंजस मोहि जनावत । जेहि सर काक कङ्क वक सूकर, क्यों मराल तहँ आवत ॥३॥ जाकी सरन जाइ कोबिद दारुन त्रयताप बुझावत । तहूँ गये मद मोह लोभ अति, सरगहुँ मिटत न सावत ॥४॥ भव-सरिता कहँ नाउ सन्त, यह कहि औरनि समुझावत । हौं तिनसों हरि ! परम बैर करि, तुम सों भलो मनावत ॥५॥ नाहिंन और ठौर मो कहँ, ताते हठि नातो लावत । राखु सरन उदार-चूड़ामनि ! तुलसिदास गुन गावत ॥६॥ शब्दार्थ-भावत = अच्छा लगता है। कङ्क = गीध। वक = बगुला। मराल = हंस। कोविद = पण्डित, ज्ञानी। सावत = ईर्ष्या, सौतियाडाह। ठौर = जगह। लावत = जोड़ता हूँ। चूड़ामनि = शिरोमणि। भावार्थ—हे हरे! आपको जो आचरण भाता है, उसे निश्चिन्ततापूर्वक भुलाकर आपका दास कहलानेमें मुझे लज्जा भी नहीं मालूम होती ॥१॥ जिसे निःसंग (आसक्ति-रहित) होकर मुनि लोग भजते हैं, जप, तप, यज्ञ-यागादि