विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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करते हैं, उसे भला मुझ-सरीखा, मन्द, नीच और महाखल किस प्रकार पा सकता है ? ॥२॥ हरिजी निर्मल हैं, और मेरा हृदय मलसे जकड़ा हुआ है। अतः (मेरा मल-ग्रसित हृदय) मुझे यह सूचित कर रहा है कि जिस (गन्दे) तालाबमें कौए, गीध बगुले और सूअर रहते हैं वहाँ हंस क्यों आने लगा ? (यहाँ तुलसीदासजीने अपने हृदयको गन्दा तालाब बनाया है, काम, क्रोधादिको कौआ, गीध आदि बनाया है और रामजीको हंस बनाया है।) ॥३॥ जिसकी शरणमें जाकर ज्ञानी लोग अपने दारुण त्रितापोंको बुझाते हैं, वहाँ जानेपर भी मुझे मद, मोह और लोभ सतावेंगे, स्वर्गमें भी ईर्ष्या नहीं छूटती ॥४॥ संसाररूपी नदीके पार जानेके लिए सन्तजन नौकारूप हैं, यह कहकर मैं दूसरोंको समझाया करता हूँ; किन्तु हे नाथ! मैं स्वयं उनसे (सन्तोंसे) गहरी शत्रुता करके आपसे कल्याणकी कामना करता या मनाता हूँ ॥५॥ मेरे लिए और कहीं ठौर नहीं है, इसीसे मैं जबर्दस्ती आपसे नाता जोड़ रहा हूँ। हे उदार-चूड़ामणि श्रीरामजी ! तुलसीदास आपके गुण गा रहा है,— उसे अपनी शरणमें रख लीजिये ॥६॥
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कौन जतन बिनती करिये । निज आचरन बिचारि हारि हिय मानि जानि डरिये ॥१॥ जेहि साधन हरि ! द्रबहु जानि जन सो हठि परिहरिये । जाते बिपति-जाल निसिदिन दुख, तेहि पथ अनुसरिये ॥२॥ जानत हूँ मन बचन करम पर-हित कीन्हें तरिये । सो बिपरीत देखि पर-सुख, बिनु कारन ही जरिये ॥३॥ स्रुति पुरान सबको मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिये । निज अभिमान मोह ईर्षा बस तिनहिं न आदरिये ॥४॥ संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जातें भवनिधि परिये । कहौ अब नाथ, कौन बलतें संसार-सोग हरिये ॥५॥ जब कब निज करुना-सुभाव तें द्रबहु तौ निस्तरिये । तुलसिदास बिस्वास आन नहिं, कत पचि-पचि मरिये ॥६॥