विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—रैन = रात। निलय = घर। टेरे = पुकारकर। पियूष = अमृत। बेरे = बेड़ा। बाँगुरो = जाल। निबेरे = काटनेसे। भावार्थ—इसीसे मैं जल्द आपकी शरणमें आया हूँ। हे नाथ ! मुझमें ज्ञान, वैराग्य, भक्ति आदि साधन स्वप्नमें भी नहीं है ॥१॥ लोभ, मोह, मद, काम और क्रोधरूपी शत्रु मुझे रात-दिन घेरे रहते हैं। इनके साथ मिला रहनेके कारण मेरा मन कुमार्गमें रत रहता है, और वह (मन) आपहीके फेरनेसे फिर सकता है ॥२॥ सन्तजन और वेद पुकारकर कह रहे हैं कि विषय, दोषोंके घर और शोकप्रद हैं। किन्तु हे हरे ! यह जानते हुए भी मेरा जो उनमें (विषयोंमें) अत्यन्त अनुराग है, वह आपहीकी प्रेरणासे ॥३॥ आप विषको अमृत और अग्निको बर्फके समान कर सकते हैं, और विना बेड़ाके ही पार कर सकते हैं। अपने परम हितके लिए आपके समान समर्थ और कृपालु (स्वामी) मैं फिर कभी ढूँढ़नेसे भी न पाऊँगा ॥४॥ हे रघुनाथजी ! अपने हृदयमें यही समझकर मैं सब छोड़छाड़कर आपके भरोसे पड़ा हूँ। क्योंकि तुलसीदासका यह विपत्ति- जाल आपहीके काटे कटेगा ॥५॥ विशेष १—'तारि सकहु बिनु बेरे'—का यह भी अर्थ हो सकता है कि 'आप बिना देर किये' (अविलम्ब) जिसे चाहें 'तार सकते हैं'। [१८८] मैं तोहिं अब जान्यो संसार। बाँधि न सकहि मोहि हरिके बल, प्रगट कपट-आगार ॥१॥ देखत ही कमनीय, कछू नाहिंन पुनि किये बिचार। ज्यों कदलीतरु-मध्य निहारत, कबहुँ न निकसत सार ॥२॥ तेरे लिये जनम अनेक मैं फिरत न पायौं पार। महामोह-मृगजल-सरिता महँ बोरयो हौं बारहिं बार ॥३॥ सुनु खल ! छल-बल कोटि किये बस होहिं न भगत उदार। सहित सहाय तहाँ बसि अब, जेहि हृदय न नन्द-कुमार ॥४॥ तासों करहु चातुरी जो नहिं जानै मरम तुम्हार। सो परि डरै मरै रजु-अहि तें बूझे नहिं व्यवहार ॥५॥