विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३१७ निज हित सुनु सठ ! हठ न करहि, जो चहहि कुसल परिवार । तुलसिदास प्रभुके दासनि तजि भजहि जहाँ मद मार ॥६॥ शब्दार्थ—कमनीय = सुन्दर। कदली-तरु = केलेका पेड़। सार = गूदा। सहाय = सेना। मार = कामदेव। भावार्थ—ऐ संसार ! मैंने तुझे अब जाना है। प्रकट हो गया कि तू कपट- का घर है। किन्तु अब तू मुझे बाँध नहीं सकता; क्योंकि अब मुझे भगवान्के बलका सहारा मिल गया है ॥१॥ तू देखनेमें ही कमनीय है, पर विचार करनेसे ज्ञात हुआ कि तू कुछ भी नहीं है (मिथ्या है); जैसे केलेके पेड़के भीतर देखनेसे कभी गूदा नहीं निकलता (वही हाल इस असार-संसारका है) ॥२॥ तेरे लिए मैं अनेक जन्मोंतक फिरता रहा, पर तेरा पार न पाया; तूने मुझे महामोहरूपी मृगजलकी नदीमें बारम्बार डुबाया ॥३॥ रे खल ! सुन, करोड़ों छल-बल करने- से भी ईश्वरके उदार भक्त तेरे वशमें नहीं हो सकते। जिस हृदयमें नन्दलाल भगवान् श्रीकृष्णका वास न हो, उस हृदयमें तू अपने दल-बलके सहित बस॥४॥ जो तेरा मर्म न जानता हो उसीसे चालाकी कर। वही मनुष्य पड़ी हुई रस्सीमें सर्पकी भ्रान्ति करके डरकर मर सकता है, जो असली रहस्यको नहीं जानता ॥५॥ रे शठ ! यदि तू अपने परिवारकी कुशल चाहता है, तो हठ न करके अपने हितकी बात सुन। तुलसीदासके स्वामी श्रीरामजीके भक्तोंको छोड़कर (तू) उन्हें भज जहाँ काम और मद आदि हों ॥६॥ विशेष १—'ज्यों कदली······सार'—केलेके खम्भेका छिलका उतारते जाइये और देखते जाइये, छिलका उतारते-उतारते ही तना खतम हो जायगा, पर उसके भीतर गूदेका दर्शन न मिलेगा; ठीक वही हाल इस संसारका है। यह इतना कमनीय होनेपर भी निःसार है। राग गौरी [८९] राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे। नाहिं तौ भव-बेगारि महँ परिहै, छूटत अति कठिनाई रे ॥१॥