विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८ विनय-पत्रिका बाँस पुरान साज सब अठकठ, सरल तिकौन खटोला रे। हमहिं दिहल करि कुटिल करमचंद मंद मोल बिनु डोला रे ॥२॥ विषम कहार मार-मद-माते चलहिं न पाउँ बटोरा रे। मंद-विलंद अमेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे ॥३॥ काँट कुराय लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे। जस जस चलिय दूरि तस तस निज बास न भेंट लगाऊ रे ॥४॥ मारग अगम, संग नहिं संबल, नाउँ गाउँ कर भूला रे। तुलसिदास भव-त्रास हरहु अब, होहु राम अनुकूला रे ॥५॥ शब्दार्थ- पुरान = पुराना। अठकठ = आठकाठ, लकड़ीके टुकड़े, बेढंगा। सरल = सड़ा हुआ। खटोला = छोटी खाट। मंद = नीचा। बिलंद = ऊँचा। अमेरा = दरार। कुराय = कंकड़। बझाऊ = अटकाव। लगाऊ = लगाव। संबल = कलेवा। भावार्थ- हे भाई ! राम-राम कहता चल, नहीं तो संसाररूपी बेगारमें (जन्म-मरण के चक्रमें) पड़ जायगा, जहाँसे छूटना बड़ा ही कठिन है किन्तु यदि तू राम-राम जपता चलेगा तो यमराजके दूतों द्वारा बेगारमें नहीं पकड़ा जा सकेगा ॥१॥ कुटिल और मन्द कर्मचन्दने (हमारे पूर्व जन्मार्जित पापोंके प्रारब्धने) बिना दामके हमें डोला दे दिया है; जिसका सब साज बेढंगा है, बाँस पुराना है और तीन कोनका सड़ा हुआ खटोला है ॥२॥ इस डोलेमें कामके मदसे या काम रूपी शराबसे मतवाले ऊँचे नीचे कदके कहार लगे हुए हैं जोकि पैर बटोरकर (कायदेसे पैर रखकर) नहीं चलते। ऊँची-नीची जमीन है, दरारें फटी हुई हैं, (दलदलकी) दलकन भी है; इन सबके झकोरेसे भारी दुःख मिलता है ॥३॥ मार्गमें काँटे और कंकड़ बिछे हैं, जगह-जगह पैरोंको लपेटनेवाली फैली हुई लताओंका अटकाव है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, त्यों-त्यों अपने (लक्ष्य स्थानसे) दूर होते जाते हैं; रास्ते में न तो बस्ती है, न किसीसे भेंट होती है, और न अन्य ही कोई लगाव है ॥४॥ अगम मार्ग है, साथमें कलेवा भी नहीं है, गाँवका नाम भी भूल गया हूँ। हे रामजी ! अब आप अनुकूल हूजिये और मेरा संसार-भय हर लीजिये ॥५॥ विशेष यहाँ तीन कोनका खटोला बनाया गया है सत्व, रज, तम-मिश्रित शरीरको ।