विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
३१८ विनय-पत्रिका बाँस पुरान साज सब अठकठ, सरल तिकौन खटोला रे। हमहिं दिहल करि कुटिल करमचंद मंद मोल बिनु डोला रे ॥२॥ विषम कहार मार-मद-माते चलहिं न पाउँ बटोरा रे। मंद-विलंद अमेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे ॥३॥ काँट कुराय लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे। जस जस चलिय दूरि तस तस निज बास न भेंट लगाऊ रे ॥४॥ मारग अगम, संग नहिं संबल, नाउँ गाउँ कर भूला रे। तुलसिदास भव-त्रास हरहु अब, होहु राम अनुकूला रे ॥५॥ शब्दार्थ- पुरान = पुराना। अठकठ = आठकाठ, लकड़ीके टुकड़े, बेढंगा। सरल = सड़ा हुआ। खटोला = छोटी खाट। मंद = नीचा। बिलंद = ऊँचा। अमेरा = दरार। कुराय = कंकड़। बझाऊ = अटकाव। लगाऊ = लगाव। संबल = कलेवा। भावार्थ- हे भाई ! राम-राम कहता चल, नहीं तो संसाररूपी बेगारमें (जन्म-मरण के चक्रमें) पड़ जायगा, जहाँसे छूटना बड़ा ही कठिन है किन्तु यदि तू राम-राम जपता चलेगा तो यमराजके दूतों द्वारा बेगारमें नहीं पकड़ा जा सकेगा ॥१॥ कुटिल और मन्द कर्मचन्दने (हमारे पूर्व जन्मार्जित पापोंके प्रारब्धने) बिना दामके हमें डोला दे दिया है; जिसका सब साज बेढंगा है, बाँस पुराना है और तीन कोनका सड़ा हुआ खटोला है ॥२॥ इस डोलेमें कामके मदसे या काम रूपी शराबसे मतवाले ऊँचे नीचे कदके कहार लगे हुए हैं जोकि पैर बटोरकर (कायदेसे पैर रखकर) नहीं चलते। ऊँची-नीची जमीन है, दरारें फटी हुई हैं, (दलदलकी) दलकन भी है; इन सबके झकोरेसे भारी दुःख मिलता है ॥३॥ मार्गमें काँटे और कंकड़ बिछे हैं, जगह-जगह पैरोंको लपेटनेवाली फैली हुई लताओंका अटकाव है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, त्यों-त्यों अपने (लक्ष्य स्थानसे) दूर होते जाते हैं; रास्ते में न तो बस्ती है, न किसीसे भेंट होती है, और न अन्य ही कोई लगाव है ॥४॥ अगम मार्ग है, साथमें कलेवा भी नहीं है, गाँवका नाम भी भूल गया हूँ। हे रामजी ! अब आप अनुकूल हूजिये और मेरा संसार-भय हर लीजिये ॥५॥ विशेष यहाँ तीन कोनका खटोला बनाया गया है सत्व, रज, तम-मिश्रित शरीरको ।
विनय-पत्रिका ३१९ शरीर नाशवान् है, इसलिए सरल (सड़ा हुआ) कहा है। शरीरकी रचना पंचीकृत पंचमहाभूत-पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश-से हुई है; अतः पंचभूत ही इस शरीररूपी डोलीके साज हैं। अविद्या ही बाँस हैं। प्रारब्ध ही इस खटोलेका बनानेवाला बढ़ई है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ही विषम कहार हैं और कामनारूपी शराब है। शराबीके पैर लड़खड़ाते हैं, यहाँ इन्द्रियरूपी मतवाले कहारोंके पैर भी ठिकानेसे नहीं पड़ रहे हैं। इस डोलीमें जीव बैठा है और उसे ईश्वररूपी नगरमें जाना है। मनका संकल्प-विकल्प ही ऊँची-नीची जमीन है, और पाँचों विषय ही दरारें और दलदल हैं। मनोरथ ही झकझोरा है। कर्म-मार्ग बड़ा दुर्गम है। उसमें स्थल- स्थलपर बझाव है—उलझन है। यह शरीररूपी डोली ज्यों-ज्यों कर्म-मार्गपर जाती है, त्यों-त्यों हम अपने लक्ष्यस्थानसे दूर हटते जाते हैं। अगम मार्ग है, डोली सड़ी-गली है, कहार उन्मत्त हैं, सत्कर्मरूपी कलेवा भी संगमें नहीं है, जहाँ जाना है, वहाँका नाम भी भूल गया है, साधु-महात्माओंसे भेंट भी नहीं होती कि मार्ग पूछा जाय; ऐसी दशामें हम कब गिर जायँगे, पता नहीं। डोली टूटेगी, तब भी गिर जायँगे, कहार चूकेंगे या फँस जायँगे, तब भी हम गिर जायँगे, कलेवा नहीं है, अतः लक्ष्यस्थानपर पहुँचनेमें देर लगेगी या बुढ़ापा आ जायगा तब भी हमारा सर्वनाश हो जायगा। ऐसी दशामें भाई रे ! राम कहता चल, राम कहता चल। क्योंकि नामके प्रतापसे यदि डोली टूट भी जायगी तो 'भवबेगारि' (यानी चौरासी लक्ष योनियों)में न फँसना पड़ेगा। १—'करमचँद'—व्यंगोक्ति है बुरे प्रारब्धके लिए। २—'लोटन'—शब्दका अर्थ कुछ टीकाकारोंने सर्प भी लिखा है। ३—इस यात्रापर महात्मा कबीरकी बानी भी देखिये:— दूर गवन तेरो हंसा हो वर अगम अपार ॥ नहिं काया नहिं माया हो ना त्रिगुन पसार । चारि बरन उहाँ नाहीं हो ना कुल बेवहार ॥ नौ सौ चौदह विद्या हो ना वेद बिचार । जप तप संयम तीरथ हो ना नेम अचार ॥
३२० विनय-पत्रिका पाँच तत्त्व न उपपति हो परले के पार । तीन देव ना तैंतिस हो न दसो अवतार ॥ सोरहो संखके आगे हो साम्यर्थ दरबार । स्वेत सिंहासन आसन हो जहाँ सबद् प्रकास ॥ पुरुष रूपका बरनउँ हो गति अपरम्पार । कोटि भानु की सोभा हो एक रोम उजार ॥ छर अच्छरसे न्यारा हो सोइ नाम हमार । सार सबद् लेइ आये हो मृतलोक मँझार ॥ चारि गुरू मिलि थापल हो जगके कनहार । उनकर बहियां उबारहु हो हंसा उतरहु पार ॥ जम्ब दीप कै हंसा हो गहु सबद् हमार । साहब कबीरा दीहल हो निरगुन टकसार ॥ २—'विषम कहार'—पर भी कबीरदासजीने कहा है:— पाये हरिनाम गले कै हरवा ॥ साँकरी खटोलिया रहनि हमारी, दुबरे दुबरे पाँचों कहरवा । ताला कुंजी हमें गुरु दीन्हीं, जब चाहो तब खोलो किवरवा ॥ परम प्रीति की चुनरी हमरी, जब चाहो तब नाचो सहरवा । कहै कबीर सुनो भाई साधो, बहुरि न आइब एही नगरवा ॥ [ १९० ] सहज सनेही राम सों तैं कियो न सहज सनेह । तातें भव-भाजन भयो, सुनु अजहूँ सिखावन एह ॥१॥ ज्यों मुख मुकुर बिलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि । त्यों सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥२॥ दै दै सुमन तिल बासि कै अरु खरि परिहरि रस लेत । स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत ॥३॥ करि बीत्यो, अब करतु है, करिबे हित मीत अपार । कबहूँ न कोउ रघुबीर सो नेहु निबाहनिहार ॥४॥
विनय-पत्रिका ३२१ जासों सब नातो फुरै, तासों न करी पहिचानि। तातें कछू समुझ्यो नहीं, कहा लाभ कह हानि ॥५॥ साँचो जान्यो झूठ को, झूठे कहँ साँचो जानि। को न गयो, को जात है, को न जैहै करि हितहानि ॥६॥ वेद कह्यो, बुध कहत हैं, अरु हौहुँ कहत हौं टेरि। तुलसी प्रभु साँचों हितू, तू हिय की आँखिन हेरि ॥७॥ शब्दार्थ—मुकुर = दर्पण। अनुहारि = सदृशता । खरि = खली। मेचक = श्याम। फुरै = सच्चे होते हैं। बुध = पण्डित। भावार्थ—तूने स्वाभाविक स्नेह करनेवाले श्रीरामजीसे सहज स्नेह नहीं किया ! इसीसे तू संसार-पात्र (बार-बार संसारमें जन्म लेने योग्य) हुआ है। अब भी तू मेरी यह शिक्षा सुन ॥१॥ जैसे दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है और उस दर्पणके भीतर उसकी वस्तुतः आकृति नहीं रहती, वैसे ही ये माता, पिता, पुत्र, स्त्री आदि सेवा करते हुए भी अपने नहीं हैं ॥२॥ जैसे फूल दे-देकर तिलको बासा जाता है और उसका रस (तेल) निकालकर खली त्याग दी जाती है, वैसे ही स्वार्थके लिए हित या सम्बन्धी बननेवाले ऐसे लोग पृथिवीपर भरे पड़े हैं जिनका मन काला है और शरीर स्वच्छ ॥३॥ तू अगणित मित्र बना चुका, अब भी बना रहा है और आगे चलकर अपनी भलाईके लिए बनायेगा, किन्तु श्रीरामजीके समान स्नेह निभानेवाला मित्र कभी भी कोई नहीं मिल सकता ॥४॥ जिसके साथ सब नाते सच्चे हैं, उसके साथ तो तूने जान-पहचान ही नहीं की! इससे कहना पड़ता है कि तूने अभीतक कुछ समझा ही नहीं कि क्या लाभ है और क्या हानि ॥५॥ तूने झूठको ही सच मान रखा है; किन्तु झूठको सच माननेवाला ऐसा कौन है जो अपने हितकी हानि करके नहीं चला गया, नहीं जा रहा है और न जायगा ? ॥६॥ वेदोंने कहा है, पंडित कहते हैं और मैं भी पुकारकर कहता हूँ कि तुलसीके प्रभु श्रीरामजी ही सच्चे हितू हैं। जरा तू अपने हृदयकी आँख खोलकर देख (बात सच है या नहीं) ॥७॥ विशेष १—'जासों सब नातो फुरै'—इसपर गोस्वामीजीकी एक सवैया बहुत बढ़िया है:— २१
३२२ विनय-पत्रिका सो जननी सो पिता सोइ भ्रात सो भामिनि सो सुत सो हित मेरो। सोई सगो सो सखा सोइ सेवक सो गुरु सो सुर साहब चेरो ॥ सो तुलसी प्रिय प्रान समान कहाँ लौं बनाइ कहौं बहुतेरो । जो तजि गेह को देह को नेह सनेह सों राम को होइ सबेरो ॥ २—'साँचो जान्यो झूठ को'—इसका यह भी अन्वय हो सकता है कि 'साँचोको झूठ जान्यो'। अर्थात्—जिसने सच्चेको झूठ और झूठको सच्चा मान रखा है।' किन्तु इस अन्वयमें कुछ खींचतान करनी पड़ती है ! [ १९१ ] एक सनेही साँचिलो केवल कोसलपालु । प्रेम-कनौड़ो रामसो नहिं दूसरो दयालु ॥१॥ तन-साथी सब स्वारथी, सुर व्यवहार सुजान । आरत-अधम-अनाथ हित को रघुवीर समान ॥२॥ नाद निठुर, समचर सिखी, सलिल-सनेह न सूर । ससि सरोग, दिनकर बड़े, पयद प्रेम-पथ क्रूर ॥३॥ जाको मन जासों बँध्यो, ताको सुखदायक सोइ । सरल सील साहिब सदा सीतापत्ति सरिस न कोइ ॥४॥ सुनि सेवा सही को करै, परिहरै को दूषन देखि । केहि दिवान दिन दीन को आदर-अनुराग बिसेखि ॥५॥ खग-सबरी पितु-मातु ज्यों माने, कपि को किये मीत । केवट भेंट्यो भरत ज्यों, ऐसो को कहु पतित-पुनीत ॥६॥ देइ अभागहिं भाग को, राखै सरन सभीत । बेद-बिदित बिरुदावली, कबि-कोबिद गावत गीत ॥७॥ कैसेउ पाँवर पातकी, जेहि लई नामकी ओट । गाँठी बाँध्यो दाम सो, परख्यो न फेरि खर-खोट ॥८॥ मन मलीन, कलि किलविषी होत सुनत जासु कृत काज । सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब-निवाज ॥९॥
विनय-पत्रिका ३२३ शब्दार्थ—कनौड़ो = कृतज्ञ, अधीन । नाद = स्वर, राग । समचर = समद्रष्टा । सिखी = अग्नि, दीपशिखा । दिवान = दरबार । किल्विषी = पापी । भावार्थ—केवल कोशलपाल श्रीरामजी ही एक सच्चे स्नेही हैं। प्रेमके अधीन होनेवाला रामजीके समान दूसरा कोई दयालु नहीं है ॥१॥ इस शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले जितने हैं, सब स्वार्थी हैं; देवता भी व्यवहार-कुशल हैं। दुखियों, अधमों और अनाथोंका हित करनेवाला रामजीके समान और कौन है ? ॥२॥ स्वर निष्ठुर है (स्वरपर मुग्ध होकर हरिण उसके पास आता है और फँस जाता है, पर स्वर उसकी रक्षा नहीं करता); अग्नि सबके साथ समान व्यवहार करनेवाला है (यहाँतक कि उसका प्रेमी पतंग उसके पास आता है, किन्तु वह उसे भी जला डालता है) जल भी स्नेहमें वीर नहीं है (मछली तो उसके बिना जीवित ही नहीं रह सकती, पर वह मछलीकी जुदाईकी कुछ भी परवाह नहीं करता); चन्द्रमा भी रोग-(ऐब) युक्त है (चकोरपर जरा भी तरस नहीं खाता); सूर्य इतना बड़ा है (पर पानी न रहनेपर अपने प्रेमी कमलको सुखा डालता है); और बादल भी प्रेम-पथके लिए क्रूर है। (क्योंकि प्रेमी चातकपर ओले बरसाता है) ॥३॥ यों तो जिसका मन जिसमें अटक गया है, उसके लिए वही सुखदायी है, पर सीतापति रामजीके समान सदैव सरल और सुशील रहने- वाला स्वामी दूसरा कोई नहीं है ॥४॥ सेवा सुनते ही उसपर सही कर देनेवाला तथा दोषोंको देखकर उनपर ध्यान न देनेवाला (रामजीके सिवा) दूसरा कौन है ? किसके दरबारमें प्रतिदिन विशेषरूपसे दीनोंका आदर और प्रेम किया जाता है ? ॥५॥ कहो तो सही, ऐसा कौन पतित-पावन है जिसने जटायु और शबरी- को पिता-माताके समान माना हो, बन्दरोंको अपना मित्र बनाया हो और गुह निषादको भाई भरतके समान हृदयसे लगाया हो ? ॥६॥ भाग्यहीनोंको भाग्यवान कौन बनाता है तथा भयभीतोंको शरणमें कौन रखता है ? यह सब विरुदावली वेदोंमें विदित है तथा कवि और पण्डित इसके गीत गाते हैं ॥७॥ कोई कैसा ही नीच और पापी क्यों न हो, जिसने राम-नामकी ओट ले ली, उसे रामजीने खरे-खोटेकी परख किये बिना ही रुपये-पैसेकी तरह गाँठ देकर बाँध लिया (अपना लिया) ॥८॥ इस कलियुगमें जिस मलिन मनवाले मनुष्यके किये हुए कर्मोंको सुनकर लोग पापी हो जाते हैं, उस तुलसीदासको भी गरीबनिवाज श्री रघुनाथजीने अपना लिया ॥९॥
३२४ विनय-पत्रिका [ १९२ ] जो पै जानकिनाथ सों नातो नेहु न नीच। स्वारथ-परमारथ कहा, कलि कुटिल विगोयो बीच ॥१॥ धरम वरन आस्रमानि के पैयत पोथि ही पुरान। करतव बिनु बेष देखिये, ज्यों सरीर बिनु प्रान ॥२॥ वेद विदित साधन सबै, सुनियत दायक फल चारि। राम-प्रेम बिनु जानिबो जैसे सर-सरिता बिनु वारि ॥३॥ नाना पथ निरबान के, नाना विधान बहु भाँति। तुलसी तू मेरे कहे जपु राम-नाम दिन-राति ॥४॥ शब्दार्थ—विगोयो = खो दिया। सर = तालाब। सरिता = नदी। निरबान = मोक्ष। भावार्थ—रे नीच ! यदि रामजीसे तेरा स्नेह और नाता नहीं है, तो क्या स्वार्थ और क्या परमार्थ दोनोंको ही तूने कुटिल कलिकालके बीचमें खो दिया ॥१॥ वर्ण और आश्रमके धर्म केवल पोथियों और पुराणोंमें ही लिखे पाये जाते हैं (अर्थात् ये केवल लिखने-पढ़नेकी वस्तुमात्र रह गये हैं, इनके अनुसार कोई भी मनुष्य आचरण नहीं करता)। कर्तव्य कुछ भी नहीं रह गया है, केवल वेष देख लीजिये। यह ठीक वैसा ही है जैसे बिना प्राणका शरीर ॥२॥ सुनते हैं कि वेदों- में विदित सब साधन अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ये चारों फल देनेवाले हैं, किन्तु यह जान लेना चाहिये कि राम-प्रेमके बिना सब साधन वैसे ही हैं जैसे जलके बिना तालाब और नदियाँ ॥३॥ निर्वाण-प्राप्तिके अनेक मार्ग हैं और नाना प्रकारके बहुतसे विधान भी हैं; किन्तु हे तुलसी ! तू मेरे कहनेसे (उन सबको छोड़कर) दिनरात केवल राम-नाम जप ॥४॥ विशेष १—'निरबान'—महाभारतके शान्ति पर्वमें मोक्षधर्म प्रकरण पढ़ने और मनन करने योग्य है। वहाँ 'निर्वाण'-प्राप्तिके अनेक मार्गोंका उल्लेख है। [ १९३ ] अजहुँ आपने रामके करतब समुझत हित होइ। कहँ तू, कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ ॥१॥
विनय-पत्रिका ३२५ रीझि निवाज्यो कबहिं तू, कब खीझि दई तोहिं गारि । दरपन बदन निहारि कै, सुविचारि मान हिय हारि ॥२॥ विगरी जनम अनेक की सुधरत पल लगै न आधु । 'पाहि कृपानिधि' प्रेम सों कहे को न राम कियो साधु ॥३॥ वाल्मिकि-केवट-कथा, कपि-भील-भालु-सनमान । सुनि सनमुख जो न राम सों, तिहि को उपदेसहि ग्यान ॥४॥ का सेवा सुग्रीवकी, का प्रीति-रीति-निरवाहु । जासु बन्धु वध्यो व्याध ज्यों, सो सुनत सोहात न काहु ॥५॥ भजन विभीषन को कहा, फल कहा दियो रघुराज । राम गरीब-निवाजके बड़ी बाँह-बोल की लाज ॥६॥ जपहि नाम रघुनाथ को, चरचा दूसरी न चालु । सुमुख, सुखद, साहिब, सुधी, समरथ, कृपालु, नतपालु ॥७॥ सजल नयन, गदगद गिरा, गहवर मन, पुलक सरीर । गावत गुनगन राम के केहि की न मिटी भव-भीर ॥८॥ प्रभु कृतग्य सरबग्य हैं, परिहरु पाछिली म्लानि । तुलसी तोसों राम सों कछु नई न जान-पहिचानि ॥९॥ शब्दार्थ—बदन = मुख । बाँह-बोल = रक्षा करनेका वचन । चालु = चलाओ । सुधी = बुद्धिमान । गहवर = प्रेमपूर्ण । भीर = दुःख । भावार्थ—रे जीव ! अब भी अपने और रामजीके करतबोंको समझनेसे तेरी भलाई हो सकती है। कहाँ तू है और कहाँ कोशलधनी श्रीरामजी ! फिर भी तुझे सब लोग क्या कहते हैं (यही न, कि तू रामका दास है) ? ॥१॥ रामजीने कब तुझपर प्रसन्न होकर कृपा की है और कब खीझकर तुझे गालियाँ दी हैं ? जरा (विवेकरूपी) दर्पणमें अपना मुँह तो देख; उसके बाद उसपर अच्छी तरह विचार करके हृदयमें हार मान ले—लज्जित हो जा (क्योंकि विचार करनेपर तुझे मालूम हो जायगा कि रामजी तुझपर सदासे कृपा करते आ रहे हैं, पर तू घोर अपराधी है, किन्तु विचार करनेके बाद तू यह न समझ ले कि तेरा सुधार ही न होगा ॥२॥ अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई बातें सुधारनेमें उन्हें आधा पल
३२६ विनय-पत्रिका भी नहीं लगता । 'हे कृपानिधि ! मेरी रक्षा कीजिये' - प्रेमके साथ इतना कहते ही ऐसा कौन (पापी) है जिसे रामजीने साधु नहीं बना दिया ? ॥३॥ वाल्मीकि और निषादकी कथा तथा बन्दर (सुग्रीव, हनुमान् , अंगदादि), भील (शवरी), भालु (जाम्बवान) आदिके सम्मानका हाल सुनकर भी जो रामजीके सम्मुख न हुआ, उसे भला कौन ज्ञानका उपदेश कर सकता है ? ॥४॥ सुग्रीवने कौनसी बड़ी सेवा की थी, और कौनसी प्रीतिकी रीति निबाही थी जिसके भाई बालिको व्याधकी तरह मार डाला ? वह बात सुनकर किसीको अच्छी नहीं लगती ॥५॥ विभीषणने ही कौनसा भजन किया था ? किन्तु रामजीने उसे क्या फल दिया ? गरीबनिवाज श्रीरामजीको रक्षा करनेके वचनकी बड़ी लाज है ॥६॥ इसलिए तू रघुनाथजीका ही नाम जपा कर, दूसरी चर्चा न चला । क्योंकि वह सुन्दर हैं, सुखदायी हैं, स्वामी हैं, बुद्धिमान हैं, समर्थ हैं, कृपालु हैं और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं ॥७॥ ऐसा कौन है जिसने आँखोंमें आँसू भरकर, प्रेमपूर्ण मनसे तथा पुलकित शरीर होकर गद्गदवाणीसे श्रीरामजीके गुणोंको गाया और उसका सांसारिक दुःख दूर नहीं हुआ ? ॥८॥ प्रभुजी कृतज्ञ हैं, सर्वज्ञ हैं, अतः तू पिछली ग्लानि छोड़ दे। ऐ तुलसी ! रामजीसे तेरी कुछ नयी जान-पहचान नहीं है ॥९॥ विशेष १- 'रीझि निवाज्यौ कबहिं तू' - इसका एक अर्थ यह भी है कि 'तूने रीझकर कब (रामजीको) रहम किया' । [ १९४ ] जो अनुराग न राम सनेही सों । तौ लह्यो लाहु कहा नर-देही सों ॥१॥ जो तनु धरि, परिहरि सब सुख, भये सुमति राम-अनुरागी । सो तनु पाइ अघाइ किये अघ, अवगुन-उदधि अभागी ॥२॥ ग्यान-बिराग, जोग-जप, तप-मख, जग मुद-मग नहिं थोरे । राम-प्रेम बिनु नेम जाय जैसे मृग-जल-जलधि-हिलोरे ॥३॥
विनय-पत्रिका ३२७ लोक विलोकि, पुरान-वेद सुनि, समुझि बूझि गुरु-ग्यानी। प्रीति-प्रतीति राम-पद-पंकज सकल-सुमंगल खानी ॥४॥ अजहुँ जानि जिय, मानि हारि हिय, होइ पलक महँ नीको। सुमिरु सनेह सहित हित रामहिं, मानु मतो तुलसी को ॥५॥ शब्दार्थ—अघाइ = भरपेट। मख = यज्ञ। मग = मार्ग। मतो = राय, सिद्धान्त। भावार्थ—यदि स्नेही रामजीसे अनुराग नहीं है, तो मनुष्य-शरीर धारण करनेसे क्या लाभ हुआ? ॥१॥ जो शरीर धारण करके अच्छी बुद्धिवाले (ज्ञानीजन) सब सुखोंको त्यागकर रामके प्रेमी बने हैं, ऐ अवगुणोंका समुद्र, अभागा! वही शरीर पाकर तूने पेट भरकर पाप किये हैं ॥२॥ संसारमें ज्ञान, वैराग्य, योग, जप, तप, यज्ञ आदि आनन्दके मार्ग थोड़ेसे नहीं हैं; किन्तु राम- प्रेमके बिना ये सब नेम वैसे ही व्यर्थ हैं जैसे मृगजलके समुद्रकी लहरें ॥३॥ संसारको देखकर, पुराणों और वेदोंको सुनकर तथा ज्ञानी गुरुओंसे समझ-बूझकर रामजीके चरण-कमलोंमें प्रेम और विश्वास होना ही सब कल्याणोंकी खानि है ॥४॥ अब भी यदि तू अपने दिलमें यह समझकर हृदयमें हार मान ले, तो पलभरमें तेरा भला हो सकता है। तुलसीदासका मत मानकर तू अपने हितके लिए स्नेहके साथ श्रीरामजीका स्मरण कर ॥५॥ विशेष १—'राम-प्रेम बिनु नेम जाय'—इसपर महात्मा कबीरने भी खूब कहा है:— मन न रँगाये, रँगाये जोगी कपरा। आसन मारि मन्दिरमें बैठे, राम नाम छाँड़िके पूजन लागे पथरा। मथवा मुड़ाय जोगी जटवा बढ़वले दढ़िया बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा ॥ जंगलमें जोगी धूनी रमवले कामके जराय जोगी होइ गैले हिंजरा। मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रँगावै, गीता-पोथी बाँचिके होइ गैले लबरा ॥ कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, जमके दुवारे बाँधल जैबे पकरा ॥ ( १९५ ) बलि जाउँ हौं राम गुसाईं कीजै कृपा अपनी नाईं ॥१॥
३२८ विनय-पत्रिका परमारथ सुरपुर-साधन सब स्वारथ सुखद भलाई। कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई ॥२॥ जहँ जहँ चित चितवत हित, तहँ नित नव विषाद् अधिकाई। रुचि-भावती भभरि भागहिं, समुहाहिं अमित अनभाई ॥३॥ आधि-मगन मन, व्याधि-विकल तन, वचन मलीन झुठाई। एतेहुँ पर तुमसों तुलसी की प्रभु सकल सनेह सगाई ॥४॥ शब्दार्थ-सुरपुर = देवलोक, स्वर्ग । विषाद् = दुःख । भभरि = डरकर । अनभाई = बुरी । भावार्थ—हे राम गुसाइँ ! मैं आपपर बलि जाता हूँ, आप अपने स्वभावके अनुकूल मुझपर कृपा कीजिये ॥१॥ परमार्थके, स्वर्गके साधनोंको एवं सुख देने- वाले और भलाई करनेवाले इहलौकिक स्वार्थोंको तथा सुन्दर चालोंको इस कलियुगने क्रोधके साथ अपनी कठिन कुचालें चलाकर लोप कर दिया है ॥२॥ यह मन जहाँ-जहाँ अपना हित देखता है, वहाँ-वहाँ नित्य नये दुःखोंकी अधिकता है । रुचिको अच्छी लगनेवाली बात डरकर भाग जाती है, और रुचिके प्रतिकूल अगणित वस्तुएँ सामने आती हैं ॥३॥ मन चिन्ता-मग्न हो रहा है, शरीर रोगसे विकल है और वाणी झुठाईके कारण मलिन हो रही है । हे प्रभो ! इतनेपर भी इस तुलसीदासका सब सम्बन्ध और स्नेह आपहीके साथ है ॥४॥ ( १९६ ) काहे को फिरत मन, करत बहु जतन, मिटै न दुख विमुख रघुकुल-वीर । कीजै जो कोटि उपाइ, त्रिबिध ताप न जाइ, कह्यो जो भुज उठाय मुनिवर कीर ॥१॥ सहज टेव विसारि तुही धौं देखु बिचारि, मिलै न मथत वारि घृत बिनु छीर । समुझि तजहि भ्रम, भजहि पद-जुगम, सेवत सुगम, गुन गहन गंभीर ॥२॥
विनय-पत्रिका ३२९ आगम निगम ग्रंथ, रिषि-मुनि, सुर-संत, सबही को एक मत सुनु, मतिधीर । तुलसिदास प्रभु बिनु पियास मरै पसु, जद्यपि है निकट सुरसरि - तीर ॥३॥ शब्दार्थ—कीर = शुकदेवजी । टेव = आदत । छीर = दूध । आगम = शास्त्र । निगम = वेद । सुरसरि = गंगाजी । भावार्थ—रे मन, तू बहुतसे उपाय क्यों करता फिरता है ? तू रघुवंश-वीर श्रीरामजीसे विमुख है, अतः तेरे दुःख दूर नहीं हो सकते । महामुनि शुकदेवजीने हाथ उठाकर (श्रीमद्भागवतमें) यह बात कही है कि करोड़ों उपाय क्यों न करो, (ईश्वर-विमुख रहनेपर) दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों प्रकारके ताप नहीं जा सकते ॥१॥ अपने सहज स्वभावको भूलकर तू ही विचारकर देख न, कहीं बिना दूधके केवल पानी मथनेसे घी मिलता है ? यही समझकर तू भ्रमको छोड़ दे और उन युगल चरणोंको भज, जो सेवा करनेमें सुगम हैं और गुण-गाम्भीर्यमें गहन हैं ॥२॥ रे मन ! सुन, वेद-शास्त्र आदि ग्रन्थोंका, तथा ऋषि-मुनियों, देवताओं, सन्तों एवं और भी जितने शान्त बुद्धिवाले हैं, उन सबका यह एक ही मत है । रे पशु तुलसीदास ! यद्यपि (राम-नामरूपी) गंगाजीका तट निकट है, फिर भी तू प्रभुके बिना प्यासा मर रहा है ॥३॥ विशेष १—'गुन गहन गँभीर'—गोस्वामीजीने अन्यत्र भी यही बात लिखी है— उमा राम-गुन गूढ़, पंडित मुनि पावहिं विरति । पावहिं मोह बिमूढ़, जे हरिविमुख न धर्म-रति ॥ —रामचरितमानस [ १९७ ] नाहिंन चरन-रति, ताहि तें सहौं विपति, कहत श्रुति सकल मुनि मतिधीर । बसै जो ससि-उछंग सुधा-स्वादित कुरंग, ताहि क्यों भ्रम निरखि रबिकर-नीर ॥१॥
३३० विनय-पत्रिका सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अग्यान, पढ़िय न समुझिय जिमि खग कीर । बझत बिनहिं पास सेमर-सुमन-आस, करत चरत तेइ फल बिनु हीर ॥२॥ कछु न साधन-सिधि, जानौं न निगम-विधि, नहिं जप-तप बस मन न समीर। तुलसिदास भरोस परम करुना-कोस, प्रभु हरिहैं विषम भवभीर ॥३॥ शब्दार्थ — उछंग = गोद। कीर = तोता। पास = पाश, जाल। चरत = चोंच मारता है, चरता है। हीर = गूदा। भावार्थ—श्रीरामजीके चरणोंमें मेरी प्रीति नहीं है, इसीसे दुःख सह रहा यह बात वेदों और धीर बुद्धिवाले समस्त मुनियोंने कही है। क्योंकि जो चन्द्रमाकी गोदमें रहकर अमृतका स्वाद लेता है, उसे मृगजलमें क्यों होने लगा ? (तात्पर्य यह कि जैसे जंगली हरिणको मृगजलका भ्रम होत पर जो हरिण चन्द्रमाका वाहन है और अमृतपान करता है, वह मृगतृ नहीं भूल सकता, उसी प्रकार ईश्वरसे विमुख प्राणियोंको संसारकी सत्त विश्वास होनेके कारण अनेक दुःख झेलने पड़ते हैं; पर हरिभक्तोंको उसका नहीं होता, क्योंकि वे जानते हैं कि यह संसार मिथ्या है) ॥१॥ जैसे पक्षी पढ़ता तो है, पर समझता कुछ नहीं, उसी प्रकार अनेक पुराणोंके रहनेपर भी मेरा अज्ञान दूर नहीं होता। मूर्ख तोता सेमरके फूलकी आ करता है और बिना गूदेके उस फलमें चोंच मारता है; इस भाँति वह जालके ही फँस जाता है (वैसे ही मनुष्य निस्तत्त्व सांसारिक विषयोंमें आस होकर अपने अज्ञानसे बँध जाता है) ॥२॥ न तो मुझमें कोई साधन है न सिद्धि ही; वैदिक विधियोंको भी मैं नहीं जानता। न मैंने जप, तप एवं म वशमें किया है, और न प्राण-वायुपर ही अधिकार जमाया है। इस तुल दासको तो बहुत बड़ा भरोसा है कि करुणाके भण्डार श्रीरामजी इसकी घ सांसारिक वेदना हर लेंगे ॥३॥
विनय-पत्रिका ३३१ राग भैरवी [ १९८ ] मन पछितैहै अवसर बीते । दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु ही ते ॥१॥ सहसबाहु, दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते । हम-हम करि धन-धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते ॥२॥ सुत-बनितादि जानि स्वारथरत, न करु नेह सबही ते । अन्तहुँ तोहिं तजैंगे पामर ! तू न तजै अबही ते ॥३॥ अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते । बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ विषय-भोग बहु घी ते ॥४॥ शब्दार्थ—ही = हृदय, मन । धाम = घर । रीते = खाली हाथ । पामर = नीच । भावार्थ—रे मन ! अवसर बीत जानेपर तुझे पछताना पड़ेगा । दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर कर्म, वचन और हृदयसे भगवान्के चरणोंका भजन कर॥१॥ सहस्रबाहु और रावण आदि (महा तेजस्वी) राजा भी बलवान कालसे नहीं बचे, जो 'हम-हम' करते हुए धन-धाम सँभालनेमें लगे रहे; पर अन्तमें खाली हाथ (इस संसारसे) उठकर चले गये ॥२॥ पुत्र, स्त्री आदिको स्वार्थरत जानकर इन सबसे स्नेह न कर । रे नीच ! ये सब तुझे अन्तमें छोड़ देंगे; इसलिए तू अभीसे इन्हें क्यों नहीं छोड़ देता ? ॥३॥ रे मूर्ख ! अब जाग, सारी दुराशाओंको हृदयसे छोड़ दे, और भगवान्से प्रेम कर । रे तुलसी ! भला कहीं कामरूपी अग्नि विषय-भोगरूपी बहुत-सा घी डालनेसे बुझती है ? ॥४॥ विशेष १—'अन्त चले'—इसपर कबीरदासके शब्दोंका भी रसास्वादन कर लीजिये:— जियरा जाहुगे हम जानी ॥ राज करंते राजा जैहैं रूप करंते रानी । चाँद भी जैहै सूरज भी जैहै, जैहै पवन औ पानी ॥
३३२ विनय-पत्रिका मानुष जन्म महा अति दुर्लभ, तुम समझो अभिमानी। लोभ नदीकी लहर बहुतु है, बूड़ोगे बिनु पानी ॥ जोगी जैहैं जंगम जैहैं औ जैहैं बड़ ज्ञानी। कहै कबीर एक सन्त न जैहैं जाको चित ठहरानी ॥ [ १९९ ] काहे को फिरत मूढ़ मन धायो । तजि हरि-चरन-सरोज सुधारस, रविकर-जल लय लायो ॥१॥ त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो । गृह, बनिता, सुत, बंधु भये बहु, मातु पिता जिन्ह जायो ॥२॥ जाते निरय-निकाय निरंतर, सोइ इन्ह तोहि सिखायो । तुव हित होइ, कटै भव-बंधन, सो मग तोहि न बतायो ॥३॥ अजहुँ बिषय कहँ जतन करत, जद्यपि बहु विधि डहँकायो । पावक-काम भोग-घृत तें सठ, कैसे परत बुझायो ॥४॥ बिषय हीन दुख, मिले बिपति अति सुख सपनेहुँ नहिं पायो । उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यों धन दुखप्रद श्रुति गायो ॥५॥ छिन-छिन छीन होत जीवन, दुर्लभ तनु वृथा गँवायो । तुलसिदास हरि भजहि आस तजि, काल-उरग जग खायो ॥६॥ शब्दार्थ—त्रिजग = तिर्यक् (पशुपक्षी) । निरय = नरक । निकाय = समूह । डहँकायो = ठगा गया । प्रेत-पावक = प्रेतकी आग । भावार्थ—रे मूढ़ मन ! तू किसलिए दौड़ता फिर रहा है ? भगवच्चरणा- रविन्दके सुधारसको छोड़कर तूने मृगतृष्णाके जलमें लगन लगा रखी है ॥१॥ पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, राक्षस एवं संसारमें और जितनी योनियाँ हैं, सबमें तू घूम आया । बहुतसे घर, स्त्री, पुत्र, भाई तथा तुझे उत्पन्न करनेवाले माता- पिता हुए ॥२॥ किन्तु इन सबने तुझे वही सिखाया जिससे तेरे लिए नरक-समूह निरन्तर बना रहे (तुझे नरकोंमें ही रहना पड़े); ऐसा मार्ग इन सबने तुझे नहीं बताया जिससे तेरा हित हो, और संसार-बन्धन कट जाय ॥३॥ यद्यपि तू अनेक तरहसे ठगा गया, फिर भी तू अभीतक विषयोंके ही लिए यत्न कर रहा
है। किन्तु रे दुष्ट ! कामरूपी अग्निमें भोगरूपी घी डालते रहनेसे वह कैसे बुझेगी ? ॥४॥ विषयोंके साधनसे रहित होनेमें भी दुःख हुआ और विषयोंके मिल जानेपर तेरी भारी विपत्ति हुई; तुझे तो स्वप्नमें भी सुख नहीं मिला। इसलिए वेदोंने विषयरूपी धनको दोनों ही प्रकारसे भूतके लुककी तरह दुःखप्रद कहा है; (तात्पर्य यह कि विषयी पुरुषोंको न तो विषयकी प्राप्तिमें ही सुख मिलता है और न अप्राप्तिमें ही) ॥५॥ क्षण-प्रति-क्षण तेरा जीवन क्षीण होता जा रहा है, तूने इस दुर्लभ शरीरको व्यर्थ ही खो दिया। ऐ तुलसीदास ! तू सब आशाओं- को छोड़कर हरिभजन कर। देख, कालरूपी सर्प संसारको खाये जा रहा है ॥६॥ [ २०० ] ताँवे सो पीठि मनहुँ तन पायो । नीच, मीच जानत न सीस पर, ईस निपट बिसरायो ॥१॥ अवनि-रवनि, धन-धाम, सुहृद-सुत, को न इन्हहिं अपनायो ? काके भये, गये सँग काके, सब सनेह छल-छायों ॥२॥ जिन्ह भूपनि जग-जीति, बाँधि जम, अपनी बाँह वसायो । तेऊ काल कलेऊ कीन्हें, तू गिनती कव आयो ॥३॥ देखु विचारि, सार का साँचो, कहा निगम निजु गायो । भजहि न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि, जेहि महेस मन लायो ॥४॥ शब्दार्थ—निपट = बिलकुल । रवनि = रमणी । छायो = भरा हुआ है। निजु = यथार्थतः । भावार्थ—मानो तूने ताँबेसे मढ़ा हुआ शरीर पाया है। (अर्थात् तूने इस नश्वर शरीरको अजर-अमर समझ लिया है) । रे नीच ! तू नहीं जानता कि मौत तेरे सिरपर (खड़ी) है, फिर भी तूने परमात्माको बिलकुल ही भुला दिया है ॥१॥ पृथिवी, स्त्री, धन, मकान, सुहृद् और पुत्र इन सबको किसने नहीं अपनाया ? (अर्थात् सबने अपनाया)। किन्तु ये किसके हुए ? किसके साथ गये ? यह सब स्नेह छलसे भरा हुआ है ॥२॥ जिन राजाओंने संसारको जीतकर अपनी भुजाओंके बलसे यमराजको बाँधकर अधीन कर लिया था, उन्हें भी जब प्रबल काल कलेवा कर गया, तो तू किस गिनतीमें है ॥३॥ विचार कर देख, सच्चा तथ्य
३३४ विनय-पत्रिका क्या है, वेदोंने यथार्थतः क्या कहा है। हे तुलसी ! अब भी तू सोच-समझकर उसे नहीं भज रहा है, जिसमें भगवान् शंकरजीने अपना मन लगा रखा है ॥४॥ विशेष १—‘अवनि······अपनायो’—किन्तु इनके अपनानेसे क्या हुआ ? देखिये इसपर गुसाईंजी क्या कहते हैं— झूमत द्वार अनेक मतङ्ग जँजीर जरे मद अम्बु चुचाते। तीख तुरङ्ग मनोगति चञ्चल पौनके गौनहु ते बढ़ि जाते ॥ भीतर चन्द्रमुखी अवलोकति बाहर भूप खड़े न समाते। ऐसे भये तौ कहा तुलसी जो पै जानकीनाथके रङ्ग न राते ॥ [ २०१ ] लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहुँ कवहूँक घटत न काज पराये ॥१॥ जो सुख सुरपुर-नरक, गेह-बन आवत बिनहिं बुलाये। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन, समुझत नहिं समुझाये ॥२॥ पर-दारा, पर-द्रोह, मोह वस किये मूढ़ मन भाये। गरभबास दुखरासि जातना तीव्र बिपति बिसराये ॥३॥ भय-निद्रा, मैथुन-अहार, सबके समान जग जाये। सुर-दुर्लभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गँवाये ॥४॥ गई न निज-पर-बुद्धि, सुद्ध ह्वै रहे न राम-लय लाये। तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनिके पछिताये ॥५॥ शब्दार्थ—मैथुन = स्त्रीप्रसंग। जाये = जन्म लिया है। लय = प्रीति, ध्यान। भावार्थ—मनुष्य-शरीर पानेसे क्या लाभ हुआ, यदि वह शरीर, वचन और मनसे स्वप्नमें भी कभी दूसरोंके काम नहीं आया ॥१॥ जो सुख स्वर्ग, नरक, घर और वनमें बिना बुलाये ही आ जाता है, उस सुखके लिए रे मन ! तू बहुत-से यत्न करता है और समझानेपर भी नहीं समझता ॥२॥ हे मूढ़ ! तूने मोहवश होकर दूसरेकी स्त्रीके लिए और दूसरोंसे वैर करनेके लिए मनमाने काम
विनय-पत्रिका ३३५ किये। तूने गर्भवासके महान् दुःख, तीव्र यातना और विपत्तिको भुला दिया; तभी तो ऐसा कर रहा है ! यदि उस कष्टकी तुझे जरा भी सुध होती तो क्या तू फिर वही यंत्रणा भोगनेका काम करता ? (कभी नहीं) ॥३॥ यों तो संसारमें जिसने जन्म लिया है, सबमें भय, निद्रा, मैथुन, आहार आदि एक-से हैं; किन्तु तूने देवताओंके लिए दुर्लभ मानव-शरीर धारण करनेपर भी ईश्वर-भजन नहीं किया, मद और अभिमानमें चूर होकर उसे खो दिया (ऐसी दशामें तुझमें और संसारके इतर-प्राणियोंमें अन्तर ही क्या रहा ?) ॥४॥ यदि अपने-परायेकी बुद्धि न गयी, और शुद्ध भावसे रामजीमें प्रीति न की, तो तुलसीदास कहते हैं कि यह अवसर बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या (लाभ) होगा ? ॥५॥ विशेष १—'भय निद्रा ॰॰॰॰जाये'—इस विषयमें लिखा है- 'आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥ —महाभारत, शान्तिपर्व अर्थात् आहार, निद्रा, भय और मैथुन, मनुष्यों और पशुओंके लिए समान ही स्वाभाविक है। उनमें भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन्हें मर्यादित करनेका) । इस धर्मसे हीन मनुष्य पशुके समान ही है। [ २०२ ] काजु कहा नरतनु धरि साध्यो । पर-उपकार सार स्रुति को जो, सो धोखेहु न विचार्यो ॥१॥ द्वैत मूल, भय-सूल, सोक-फल, भवतरु टरैं न टाऱ्यो । राम भजन-तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निबाऱ्यो ॥२॥ संसय-सिंधु नाम-बोहित भजि निज आतमा न ताऱ्यो । जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हाऱ्यो ॥३॥ देखि आनकी सहज सम्पदा द्वेष-अनल मन-जाऱ्यो । सम, दम, दया दीन-पालन, सीतल हिय हरि न सँभाऱ्यो ॥४॥
३३६ विनय-पत्रिका प्रभु गुरु पिता सखा रघुपति तैं मन क्रम बचन बिसारयो । तुलसिदास यहि आस, सरन राखिहि जेहि गीध उबारयो ॥५॥ शब्दार्थ- कुठार = कुल्हाड़ी । आनकी = दूसरेकी । अनल = आग । भावार्थ-मनुष्य-शरीर धारण करके तूने कौन-सा काम पूरा किया ? जो परोपकार वेदोंका सार या निचोड़ है, उसपर तूने भूलकर भी विचार नहीं किया (करना तो दूर रहा) ॥१॥ यह संसार वृक्षके समान है; द्वैतभाव (अर्थात् देहको आत्मा मानना) इस संसार-वृक्षकी जड़ है, भय ही चुभनेवाले काँटे हैं और शोक ही फल हैं। यह वृक्ष हटानेसे नहीं हट सकता । यह तो केवल राम-भजनरूपी तेजधारकी कुल्हाड़ी लेकर काटनेसे कटता है, सो तूने उसे नहीं काटा ॥२॥ संशय-समुद्रसे पार होनेके लिए नामरूपी नौकाका सेवन कर । तूने अपनी आत्माका उद्धार नहीं किया । तू अनेक जन्मतक विवेकहीन होकर नाना योनियोंमें घूमनेपर भी न थका ॥३॥ दूसरोंकी सहज सम्पत्ति देखकर तू अपने मनको द्वेषकी आगमें जलाता रहा; किन्तु शम, दम, दया और गरीबोंका पालन करते हुए शीतल हृदयसे परमात्माकी सेवा नहीं की ॥४॥ तूने मन, कर्म और वचनसे अपने प्रभु, गुरु, पिता और सखा श्री रघुनाथजीको भुला दिया । किन्तु तुलसीदासको यही इतनी आशा है कि जिसने गीधको उबारा है, वह मुझे भी अपनी शरणमें रख लेंगे ॥५॥ विशेष १--'पर-उपकार सार श्रुतिको'--आचार्योंने परोपकारके समान दूसरा धर्म और दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेके समान दूसरा एक भी पाप नहीं माना है । कहा भी है-- अष्टादश पुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ भर्तृहरिने भी कहा है-- 'स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः । अर्थात् परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है । २--'गीध'--११५ वें पदके विशेषमें देखिये ।
विनय-पत्रिका ३३७ [२०३] श्री हरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान। जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवान ॥१॥ परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलत अति दूरि। जद्यपि निकट हृदय निज रहें सकल भरिपूरि ॥२॥ दुइज द्वैत-मति छाँड़ि चरहि महि-मण्डल धीर। विगत मोह-माया-मद हृदय बसत रघुबीर ॥३॥ तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुन्द। गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द ॥४॥ चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित अहंकार। विमल बिचार परम पद निज सुख सहज उदार ॥५॥ पाँचइ पाँच परस, रस, सब्द, गन्ध अरु रूप। इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥६॥ छठ षटबरग करिय जय जनक-सुता-पति लागि। रघुपति-कृपा-वारि बिनु नहिं बुताइ-लोभागि ॥७॥ सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय विचार। तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥८॥ आठइँ आठ प्रकृति-पर निरविकार श्रीराम। केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम ॥९॥ नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह। ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारुन दुख लीन्ह ॥१०॥ दसइँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि। साधन वृथा होइ सब मिलहिं न सारँगपानि ॥११॥ एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ। सोइ व्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥१२॥ द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रैलोक। परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥१३॥ २२