भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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३२२ विनय-पत्रिका सो जननी सो पिता सोइ भ्रात सो भामिनि सो सुत सो हित मेरो। सोई सगो सो सखा सोइ सेवक सो गुरु सो सुर साहब चेरो ॥ सो तुलसी प्रिय प्रान समान कहाँ लौं बनाइ कहौं बहुतेरो । जो तजि गेह को देह को नेह सनेह सों राम को होइ सबेरो ॥ २—'साँचो जान्यो झूठ को'—इसका यह भी अन्वय हो सकता है कि 'साँचोको झूठ जान्यो'। अर्थात्—जिसने सच्चेको झूठ और झूठको सच्चा मान रखा है।' किन्तु इस अन्वयमें कुछ खींचतान करनी पड़ती है ! [ १९१ ] एक सनेही साँचिलो केवल कोसलपालु । प्रेम-कनौड़ो रामसो नहिं दूसरो दयालु ॥१॥ तन-साथी सब स्वारथी, सुर व्यवहार सुजान । आरत-अधम-अनाथ हित को रघुवीर समान ॥२॥ नाद निठुर, समचर सिखी, सलिल-सनेह न सूर । ससि सरोग, दिनकर बड़े, पयद प्रेम-पथ क्रूर ॥३॥ जाको मन जासों बँध्यो, ताको सुखदायक सोइ । सरल सील साहिब सदा सीतापत्ति सरिस न कोइ ॥४॥ सुनि सेवा सही को करै, परिहरै को दूषन देखि । केहि दिवान दिन दीन को आदर-अनुराग बिसेखि ॥५॥ खग-सबरी पितु-मातु ज्यों माने, कपि को किये मीत । केवट भेंट्यो भरत ज्यों, ऐसो को कहु पतित-पुनीत ॥६॥ देइ अभागहिं भाग को, राखै सरन सभीत । बेद-बिदित बिरुदावली, कबि-कोबिद गावत गीत ॥७॥ कैसेउ पाँवर पातकी, जेहि लई नामकी ओट । गाँठी बाँध्यो दाम सो, परख्यो न फेरि खर-खोट ॥८॥ मन मलीन, कलि किलविषी होत सुनत जासु कृत काज । सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब-निवाज ॥९॥