भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 334, कुल 475 में से

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पृष्ठ 334

विनय-पत्रिका ३२३ शब्दार्थ—कनौड़ो = कृतज्ञ, अधीन । नाद = स्वर, राग । समचर = समद्रष्टा । सिखी = अग्नि, दीपशिखा । दिवान = दरबार । किल्विषी = पापी । भावार्थ—केवल कोशलपाल श्रीरामजी ही एक सच्चे स्नेही हैं। प्रेमके अधीन होनेवाला रामजीके समान दूसरा कोई दयालु नहीं है ॥१॥ इस शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले जितने हैं, सब स्वार्थी हैं; देवता भी व्यवहार-कुशल हैं। दुखियों, अधमों और अनाथोंका हित करनेवाला रामजीके समान और कौन है ? ॥२॥ स्वर निष्ठुर है (स्वरपर मुग्ध होकर हरिण उसके पास आता है और फँस जाता है, पर स्वर उसकी रक्षा नहीं करता); अग्नि सबके साथ समान व्यवहार करनेवाला है (यहाँतक कि उसका प्रेमी पतंग उसके पास आता है, किन्तु वह उसे भी जला डालता है) जल भी स्नेहमें वीर नहीं है (मछली तो उसके बिना जीवित ही नहीं रह सकती, पर वह मछलीकी जुदाईकी कुछ भी परवाह नहीं करता); चन्द्रमा भी रोग-(ऐब) युक्त है (चकोरपर जरा भी तरस नहीं खाता); सूर्य इतना बड़ा है (पर पानी न रहनेपर अपने प्रेमी कमलको सुखा डालता है); और बादल भी प्रेम-पथके लिए क्रूर है। (क्योंकि प्रेमी चातकपर ओले बरसाता है) ॥३॥ यों तो जिसका मन जिसमें अटक गया है, उसके लिए वही सुखदायी है, पर सीतापति रामजीके समान सदैव सरल और सुशील रहने- वाला स्वामी दूसरा कोई नहीं है ॥४॥ सेवा सुनते ही उसपर सही कर देनेवाला तथा दोषोंको देखकर उनपर ध्यान न देनेवाला (रामजीके सिवा) दूसरा कौन है ? किसके दरबारमें प्रतिदिन विशेषरूपसे दीनोंका आदर और प्रेम किया जाता है ? ॥५॥ कहो तो सही, ऐसा कौन पतित-पावन है जिसने जटायु और शबरी- को पिता-माताके समान माना हो, बन्दरोंको अपना मित्र बनाया हो और गुह निषादको भाई भरतके समान हृदयसे लगाया हो ? ॥६॥ भाग्यहीनोंको भाग्यवान कौन बनाता है तथा भयभीतोंको शरणमें कौन रखता है ? यह सब विरुदावली वेदोंमें विदित है तथा कवि और पण्डित इसके गीत गाते हैं ॥७॥ कोई कैसा ही नीच और पापी क्यों न हो, जिसने राम-नामकी ओट ले ली, उसे रामजीने खरे-खोटेकी परख किये बिना ही रुपये-पैसेकी तरह गाँठ देकर बाँध लिया (अपना लिया) ॥८॥ इस कलियुगमें जिस मलिन मनवाले मनुष्यके किये हुए कर्मोंको सुनकर लोग पापी हो जाते हैं, उस तुलसीदासको भी गरीबनिवाज श्री रघुनाथजीने अपना लिया ॥९॥