विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ विनय-पत्रिका प्रभु गुरु पिता सखा रघुपति तैं मन क्रम बचन बिसारयो । तुलसिदास यहि आस, सरन राखिहि जेहि गीध उबारयो ॥५॥ शब्दार्थ- कुठार = कुल्हाड़ी । आनकी = दूसरेकी । अनल = आग । भावार्थ-मनुष्य-शरीर धारण करके तूने कौन-सा काम पूरा किया ? जो परोपकार वेदोंका सार या निचोड़ है, उसपर तूने भूलकर भी विचार नहीं किया (करना तो दूर रहा) ॥१॥ यह संसार वृक्षके समान है; द्वैतभाव (अर्थात् देहको आत्मा मानना) इस संसार-वृक्षकी जड़ है, भय ही चुभनेवाले काँटे हैं और शोक ही फल हैं। यह वृक्ष हटानेसे नहीं हट सकता । यह तो केवल राम-भजनरूपी तेजधारकी कुल्हाड़ी लेकर काटनेसे कटता है, सो तूने उसे नहीं काटा ॥२॥ संशय-समुद्रसे पार होनेके लिए नामरूपी नौकाका सेवन कर । तूने अपनी आत्माका उद्धार नहीं किया । तू अनेक जन्मतक विवेकहीन होकर नाना योनियोंमें घूमनेपर भी न थका ॥३॥ दूसरोंकी सहज सम्पत्ति देखकर तू अपने मनको द्वेषकी आगमें जलाता रहा; किन्तु शम, दम, दया और गरीबोंका पालन करते हुए शीतल हृदयसे परमात्माकी सेवा नहीं की ॥४॥ तूने मन, कर्म और वचनसे अपने प्रभु, गुरु, पिता और सखा श्री रघुनाथजीको भुला दिया । किन्तु तुलसीदासको यही इतनी आशा है कि जिसने गीधको उबारा है, वह मुझे भी अपनी शरणमें रख लेंगे ॥५॥ विशेष १--'पर-उपकार सार श्रुतिको'--आचार्योंने परोपकारके समान दूसरा धर्म और दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेके समान दूसरा एक भी पाप नहीं माना है । कहा भी है-- अष्टादश पुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ भर्तृहरिने भी कहा है-- 'स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः । अर्थात् परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है । २--'गीध'--११५ वें पदके विशेषमें देखिये ।