विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३३५ किये। तूने गर्भवासके महान् दुःख, तीव्र यातना और विपत्तिको भुला दिया; तभी तो ऐसा कर रहा है ! यदि उस कष्टकी तुझे जरा भी सुध होती तो क्या तू फिर वही यंत्रणा भोगनेका काम करता ? (कभी नहीं) ॥३॥ यों तो संसारमें जिसने जन्म लिया है, सबमें भय, निद्रा, मैथुन, आहार आदि एक-से हैं; किन्तु तूने देवताओंके लिए दुर्लभ मानव-शरीर धारण करनेपर भी ईश्वर-भजन नहीं किया, मद और अभिमानमें चूर होकर उसे खो दिया (ऐसी दशामें तुझमें और संसारके इतर-प्राणियोंमें अन्तर ही क्या रहा ?) ॥४॥ यदि अपने-परायेकी बुद्धि न गयी, और शुद्ध भावसे रामजीमें प्रीति न की, तो तुलसीदास कहते हैं कि यह अवसर बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या (लाभ) होगा ? ॥५॥ विशेष १—'भय निद्रा ॰॰॰॰जाये'—इस विषयमें लिखा है- 'आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥ —महाभारत, शान्तिपर्व अर्थात् आहार, निद्रा, भय और मैथुन, मनुष्यों और पशुओंके लिए समान ही स्वाभाविक है। उनमें भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन्हें मर्यादित करनेका) । इस धर्मसे हीन मनुष्य पशुके समान ही है। [ २०२ ] काजु कहा नरतनु धरि साध्यो । पर-उपकार सार स्रुति को जो, सो धोखेहु न विचार्यो ॥१॥ द्वैत मूल, भय-सूल, सोक-फल, भवतरु टरैं न टाऱ्यो । राम भजन-तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निबाऱ्यो ॥२॥ संसय-सिंधु नाम-बोहित भजि निज आतमा न ताऱ्यो । जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हाऱ्यो ॥३॥ देखि आनकी सहज सम्पदा द्वेष-अनल मन-जाऱ्यो । सम, दम, दया दीन-पालन, सीतल हिय हरि न सँभाऱ्यो ॥४॥