विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ विनय-पत्रिका क्या है, वेदोंने यथार्थतः क्या कहा है। हे तुलसी ! अब भी तू सोच-समझकर उसे नहीं भज रहा है, जिसमें भगवान् शंकरजीने अपना मन लगा रखा है ॥४॥ विशेष १—‘अवनि······अपनायो’—किन्तु इनके अपनानेसे क्या हुआ ? देखिये इसपर गुसाईंजी क्या कहते हैं— झूमत द्वार अनेक मतङ्ग जँजीर जरे मद अम्बु चुचाते। तीख तुरङ्ग मनोगति चञ्चल पौनके गौनहु ते बढ़ि जाते ॥ भीतर चन्द्रमुखी अवलोकति बाहर भूप खड़े न समाते। ऐसे भये तौ कहा तुलसी जो पै जानकीनाथके रङ्ग न राते ॥ [ २०१ ] लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहुँ कवहूँक घटत न काज पराये ॥१॥ जो सुख सुरपुर-नरक, गेह-बन आवत बिनहिं बुलाये। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन, समुझत नहिं समुझाये ॥२॥ पर-दारा, पर-द्रोह, मोह वस किये मूढ़ मन भाये। गरभबास दुखरासि जातना तीव्र बिपति बिसराये ॥३॥ भय-निद्रा, मैथुन-अहार, सबके समान जग जाये। सुर-दुर्लभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गँवाये ॥४॥ गई न निज-पर-बुद्धि, सुद्ध ह्वै रहे न राम-लय लाये। तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनिके पछिताये ॥५॥ शब्दार्थ—मैथुन = स्त्रीप्रसंग। जाये = जन्म लिया है। लय = प्रीति, ध्यान। भावार्थ—मनुष्य-शरीर पानेसे क्या लाभ हुआ, यदि वह शरीर, वचन और मनसे स्वप्नमें भी कभी दूसरोंके काम नहीं आया ॥१॥ जो सुख स्वर्ग, नरक, घर और वनमें बिना बुलाये ही आ जाता है, उस सुखके लिए रे मन ! तू बहुत-से यत्न करता है और समझानेपर भी नहीं समझता ॥२॥ हे मूढ़ ! तूने मोहवश होकर दूसरेकी स्त्रीके लिए और दूसरोंसे वैर करनेके लिए मनमाने काम