भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 344, कुल 475 में से

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पृष्ठ 344

है। किन्तु रे दुष्ट ! कामरूपी अग्निमें भोगरूपी घी डालते रहनेसे वह कैसे बुझेगी ? ॥४॥ विषयोंके साधनसे रहित होनेमें भी दुःख हुआ और विषयोंके मिल जानेपर तेरी भारी विपत्ति हुई; तुझे तो स्वप्नमें भी सुख नहीं मिला। इसलिए वेदोंने विषयरूपी धनको दोनों ही प्रकारसे भूतके लुककी तरह दुःखप्रद कहा है; (तात्पर्य यह कि विषयी पुरुषोंको न तो विषयकी प्राप्तिमें ही सुख मिलता है और न अप्राप्तिमें ही) ॥५॥ क्षण-प्रति-क्षण तेरा जीवन क्षीण होता जा रहा है, तूने इस दुर्लभ शरीरको व्यर्थ ही खो दिया। ऐ तुलसीदास ! तू सब आशाओं- को छोड़कर हरिभजन कर। देख, कालरूपी सर्प संसारको खाये जा रहा है ॥६॥ [ २०० ] ताँवे सो पीठि मनहुँ तन पायो । नीच, मीच जानत न सीस पर, ईस निपट बिसरायो ॥१॥ अवनि-रवनि, धन-धाम, सुहृद-सुत, को न इन्हहिं अपनायो ? काके भये, गये सँग काके, सब सनेह छल-छायों ॥२॥ जिन्ह भूपनि जग-जीति, बाँधि जम, अपनी बाँह वसायो । तेऊ काल कलेऊ कीन्हें, तू गिनती कव आयो ॥३॥ देखु विचारि, सार का साँचो, कहा निगम निजु गायो । भजहि न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि, जेहि महेस मन लायो ॥४॥ शब्दार्थ—निपट = बिलकुल । रवनि = रमणी । छायो = भरा हुआ है। निजु = यथार्थतः । भावार्थ—मानो तूने ताँबेसे मढ़ा हुआ शरीर पाया है। (अर्थात् तूने इस नश्वर शरीरको अजर-अमर समझ लिया है) । रे नीच ! तू नहीं जानता कि मौत तेरे सिरपर (खड़ी) है, फिर भी तूने परमात्माको बिलकुल ही भुला दिया है ॥१॥ पृथिवी, स्त्री, धन, मकान, सुहृद् और पुत्र इन सबको किसने नहीं अपनाया ? (अर्थात् सबने अपनाया)। किन्तु ये किसके हुए ? किसके साथ गये ? यह सब स्नेह छलसे भरा हुआ है ॥२॥ जिन राजाओंने संसारको जीतकर अपनी भुजाओंके बलसे यमराजको बाँधकर अधीन कर लिया था, उन्हें भी जब प्रबल काल कलेवा कर गया, तो तू किस गिनतीमें है ॥३॥ विचार कर देख, सच्चा तथ्य