भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 348

विनय-पत्रिका ३३७ [२०३] श्री हरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान। जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवान ॥१॥ परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलत अति दूरि। जद्यपि निकट हृदय निज रहें सकल भरिपूरि ॥२॥ दुइज द्वैत-मति छाँड़ि चरहि महि-मण्डल धीर। विगत मोह-माया-मद हृदय बसत रघुबीर ॥३॥ तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुन्द। गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द ॥४॥ चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित अहंकार। विमल बिचार परम पद निज सुख सहज उदार ॥५॥ पाँचइ पाँच परस, रस, सब्द, गन्ध अरु रूप। इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥६॥ छठ षटबरग करिय जय जनक-सुता-पति लागि। रघुपति-कृपा-वारि बिनु नहिं बुताइ-लोभागि ॥७॥ सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय विचार। तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥८॥ आठइँ आठ प्रकृति-पर निरविकार श्रीराम। केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम ॥९॥ नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह। ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारुन दुख लीन्ह ॥१०॥ दसइँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि। साधन वृथा होइ सब मिलहिं न सारँगपानि ॥११॥ एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ। सोइ व्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥१२॥ द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रैलोक। परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥१३॥ २२