भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

३३८ विनय-पत्रिका तेरसि तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवन्त । मन-क्रम-बचन अगोचर, व्यापक, व्याप्य, अनन्त ॥१४॥ चौदसि चौदह भुवन अचर - चर - रूप गोपाल । भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल ॥१५॥ पूनो प्रेम - भगति - रस हरि - रस जानहिं दास । सम, सीतल, गत-मान, ग्यानरत, बिषय - उदास ॥१६॥ त्रिविध सूल होलिय जरै, खेलिय अब फागु । जो जिय चहसि परम सुख, तौ यहि मारग लागु ॥१७॥ श्रुति-पुरान - बुध - सम्मत चाँचरि चरित मुरारि । करि बिचार भव तरिय, परिय न कबहुँ जमधारि ॥१८॥ संसय-समन, दमन दुख, सुखनिधान हरि एक । साधु कृपा बिनु मिलहिं न, करिय उपाय अनेक ॥१९॥ भवँसागर कहँ नाव सुद्ध संतनके चरन । तुलसिदास प्रयास बिनु मिलहिं राम दुखहरन ॥२०॥ शब्दार्थ—चरहि = विचरण कर । त्रिगुन = सत्व, रज, तम । श्रीरमन = लक्ष्मीकान्त । मुकुन्द = विष्णु । षटबरग = शरीरके भीतर स्थित परलोक विरोधी शत्रुओंका समूह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि । लीन्ह = ले लिया, खरीद लिया । सारँगपानि = हाथमें धनुष धारण करनेवाले रामचन्द्र । गोपाल = श्रीकृष्ण । अति = जड़से । गत-मान = अहंकार- रहित । उदास = उदासीन । चाँचरि = होलीके गीत । भावार्थ—हे मन ! तू अभिमानको छोड़कर श्रीहरिरूप गुरुके उन चरण- कमलोंका भजन कर, जिनकी सेवा करनेसे आनन्दके भण्डार भगवान् हरि मिलते हैं ॥१॥ फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाकी तरह सबसे पहले प्रेमके बिना रामजीका मिलना बहुत दूर है (अर्थात् जैसे पहली तिथि प्रतिपदा है, उसी तरह भगवत्प्राप्तिके लिए पहली वस्तु प्रेम है) यद्यपि रामजी अपने हृदयमें निवास करते हैं तथापि प्रेमके बिना उनका मिलना कठिन है ॥२॥ दूजके समान दूसरा साधन यह है कि द्वैत-बुद्धि छोड़कर धीर भावसे भू-मण्डलपर विचरण कर ; मोह, माया और मदसे रहित हृदयमें ही श्रीरघुनाथजी निवास करते हैं (इसलिए तू इन विकारोंको छोड़ दे) ॥३॥ तीजके समान तीसरा साधन यह है कि सत्व-

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस) · पृष्ठ 349, कुल 475 में से · BharatKosha