भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 350

विनय-पत्रिका ३३९ रज-तम इन तीन गुणोंसे परे परमपुरुष लक्ष्मीकान्त मुकुन्द भगवान्‌का परमानन्द (स्वरूपानन्द) गुण-स्वभावका त्याग किये बिना दुर्लभ है । ब्रह्म साक्षात्कार करनेके लिए गुणोंका त्याग करना आवश्यक है ॥४॥ चौथके समान चौथा उपाय है मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारका त्याग करना (अर्थात्, तादात्म्य भाव त्याग कर अन्तःकरणका द्रष्टा बन जाना चाहिये) । इनका त्याग करनेके बाद विमल विचार उत्पन्न होकर आत्मानन्दरूप परम पदको प्राप्त होना सहज हो जाता है ॥५॥ पंचमीकी तरह पाँचवाँ उपाय यह है कि पंच ज्ञानेन्द्रियोंके जो पाँच विषय हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं, उनका कहना न मान, नहीं तो संसाररूपी कुएँमें गिर जायगा ॥६॥ छठकी तरह छठा उपाय यह है कि जानकी-वल्लभ श्रीरामजीकी प्राप्तिके लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरपर विजयलाभ करना चाहिये । लोभरूपी आग ईश्वरीय कृपारूपी जलके बिना नहीं बुझती (अर्थात् लोभ बड़ा ही प्रबल है, अतः मन, वचन, कर्मसे ऐसा काम करना चाहिए जिसमें इसपर जय प्राप्त हो सके और तुझपर भगवान् की कृपा हो) ॥७॥ सप्तमीके समान सातवाँ यत्न यह है कि सात धातुओं (त्वचा- रक्त, मांस, हड्डी, मज्जा, मेद, शुक्र) से बने हुए शरीरका विचार करना चाहिये । अर्थात् यह समझना चाहिये कि यह शरीर नाशवान् है, इसे काम-क्रोधादिके वशमें नहीं होने देना चाहिये । इस शरीरका एक ही फल है; वह यह कि परोप- कार करो ॥८॥ अष्टमीके समान आठवाँ साधन यह है कि षट्-विकार-रहित श्रीरामजी अष्ट प्रकृतिसे परे हैं, अतः यह जानना चाहिये कि जबतक हृदयमें अनेक तरहकी कामनाएँ बस रही हैं, तबतक वह प्रभु किस तरह मिल सकते हैं ? तात्पर्य यह है कि इच्छाओंका त्याग करना चाहिये ॥९॥ नौमीके समान नवाँ साधन यह है कि नौ दरवाजेकी इस पुरी (शरीर)में बसकर जिसने अपना भला न किया, वह आदमी अनेक योनियोंमें भटकता फिरता है। उसे समझ लेना चाहिये कि मैंने दारुण दुःख खरीद लिया ॥१०॥ दशमीके समान दसवाँ उपाय यह है कि दसों इन्द्रियों (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय और पञ्च कर्मेन्द्रिय) का संयम करना चाहिये । जो न कर सके, उसे अपने हृदयमें समझ लेना चाहिये कि सब साधन व्यर्थ हुए और सारंग-पाणि भगवान् रामचन्द्रजी न मिलेंगे ॥११॥ एकादशीके समान ग्यारहवाँ साधन यह है कि मनको वशमें करके केवल उस एक निःसंग,