विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३२७ लोक विलोकि, पुरान-वेद सुनि, समुझि बूझि गुरु-ग्यानी। प्रीति-प्रतीति राम-पद-पंकज सकल-सुमंगल खानी ॥४॥ अजहुँ जानि जिय, मानि हारि हिय, होइ पलक महँ नीको। सुमिरु सनेह सहित हित रामहिं, मानु मतो तुलसी को ॥५॥ शब्दार्थ—अघाइ = भरपेट। मख = यज्ञ। मग = मार्ग। मतो = राय, सिद्धान्त। भावार्थ—यदि स्नेही रामजीसे अनुराग नहीं है, तो मनुष्य-शरीर धारण करनेसे क्या लाभ हुआ? ॥१॥ जो शरीर धारण करके अच्छी बुद्धिवाले (ज्ञानीजन) सब सुखोंको त्यागकर रामके प्रेमी बने हैं, ऐ अवगुणोंका समुद्र, अभागा! वही शरीर पाकर तूने पेट भरकर पाप किये हैं ॥२॥ संसारमें ज्ञान, वैराग्य, योग, जप, तप, यज्ञ आदि आनन्दके मार्ग थोड़ेसे नहीं हैं; किन्तु राम- प्रेमके बिना ये सब नेम वैसे ही व्यर्थ हैं जैसे मृगजलके समुद्रकी लहरें ॥३॥ संसारको देखकर, पुराणों और वेदोंको सुनकर तथा ज्ञानी गुरुओंसे समझ-बूझकर रामजीके चरण-कमलोंमें प्रेम और विश्वास होना ही सब कल्याणोंकी खानि है ॥४॥ अब भी यदि तू अपने दिलमें यह समझकर हृदयमें हार मान ले, तो पलभरमें तेरा भला हो सकता है। तुलसीदासका मत मानकर तू अपने हितके लिए स्नेहके साथ श्रीरामजीका स्मरण कर ॥५॥ विशेष १—'राम-प्रेम बिनु नेम जाय'—इसपर महात्मा कबीरने भी खूब कहा है:— मन न रँगाये, रँगाये जोगी कपरा। आसन मारि मन्दिरमें बैठे, राम नाम छाँड़िके पूजन लागे पथरा। मथवा मुड़ाय जोगी जटवा बढ़वले दढ़िया बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा ॥ जंगलमें जोगी धूनी रमवले कामके जराय जोगी होइ गैले हिंजरा। मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रँगावै, गीता-पोथी बाँचिके होइ गैले लबरा ॥ कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, जमके दुवारे बाँधल जैबे पकरा ॥ ( १९५ ) बलि जाउँ हौं राम गुसाईं कीजै कृपा अपनी नाईं ॥१॥