भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 337

३२६ विनय-पत्रिका भी नहीं लगता । 'हे कृपानिधि ! मेरी रक्षा कीजिये' - प्रेमके साथ इतना कहते ही ऐसा कौन (पापी) है जिसे रामजीने साधु नहीं बना दिया ? ॥३॥ वाल्मीकि और निषादकी कथा तथा बन्दर (सुग्रीव, हनुमान् , अंगदादि), भील (शवरी), भालु (जाम्बवान) आदिके सम्मानका हाल सुनकर भी जो रामजीके सम्मुख न हुआ, उसे भला कौन ज्ञानका उपदेश कर सकता है ? ॥४॥ सुग्रीवने कौनसी बड़ी सेवा की थी, और कौनसी प्रीतिकी रीति निबाही थी जिसके भाई बालिको व्याधकी तरह मार डाला ? वह बात सुनकर किसीको अच्छी नहीं लगती ॥५॥ विभीषणने ही कौनसा भजन किया था ? किन्तु रामजीने उसे क्या फल दिया ? गरीबनिवाज श्रीरामजीको रक्षा करनेके वचनकी बड़ी लाज है ॥६॥ इसलिए तू रघुनाथजीका ही नाम जपा कर, दूसरी चर्चा न चला । क्योंकि वह सुन्दर हैं, सुखदायी हैं, स्वामी हैं, बुद्धिमान हैं, समर्थ हैं, कृपालु हैं और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं ॥७॥ ऐसा कौन है जिसने आँखोंमें आँसू भरकर, प्रेमपूर्ण मनसे तथा पुलकित शरीर होकर गद्गदवाणीसे श्रीरामजीके गुणोंको गाया और उसका सांसारिक दुःख दूर नहीं हुआ ? ॥८॥ प्रभुजी कृतज्ञ हैं, सर्वज्ञ हैं, अतः तू पिछली ग्लानि छोड़ दे। ऐ तुलसी ! रामजीसे तेरी कुछ नयी जान-पहचान नहीं है ॥९॥ विशेष १- 'रीझि निवाज्यौ कबहिं तू' - इसका एक अर्थ यह भी है कि 'तूने रीझकर कब (रामजीको) रहम किया' । [ १९४ ] जो अनुराग न राम सनेही सों । तौ लह्यो लाहु कहा नर-देही सों ॥१॥ जो तनु धरि, परिहरि सब सुख, भये सुमति राम-अनुरागी । सो तनु पाइ अघाइ किये अघ, अवगुन-उदधि अभागी ॥२॥ ग्यान-बिराग, जोग-जप, तप-मख, जग मुद-मग नहिं थोरे । राम-प्रेम बिनु नेम जाय जैसे मृग-जल-जलधि-हिलोरे ॥३॥

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