विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३२५ रीझि निवाज्यो कबहिं तू, कब खीझि दई तोहिं गारि । दरपन बदन निहारि कै, सुविचारि मान हिय हारि ॥२॥ विगरी जनम अनेक की सुधरत पल लगै न आधु । 'पाहि कृपानिधि' प्रेम सों कहे को न राम कियो साधु ॥३॥ वाल्मिकि-केवट-कथा, कपि-भील-भालु-सनमान । सुनि सनमुख जो न राम सों, तिहि को उपदेसहि ग्यान ॥४॥ का सेवा सुग्रीवकी, का प्रीति-रीति-निरवाहु । जासु बन्धु वध्यो व्याध ज्यों, सो सुनत सोहात न काहु ॥५॥ भजन विभीषन को कहा, फल कहा दियो रघुराज । राम गरीब-निवाजके बड़ी बाँह-बोल की लाज ॥६॥ जपहि नाम रघुनाथ को, चरचा दूसरी न चालु । सुमुख, सुखद, साहिब, सुधी, समरथ, कृपालु, नतपालु ॥७॥ सजल नयन, गदगद गिरा, गहवर मन, पुलक सरीर । गावत गुनगन राम के केहि की न मिटी भव-भीर ॥८॥ प्रभु कृतग्य सरबग्य हैं, परिहरु पाछिली म्लानि । तुलसी तोसों राम सों कछु नई न जान-पहिचानि ॥९॥ शब्दार्थ—बदन = मुख । बाँह-बोल = रक्षा करनेका वचन । चालु = चलाओ । सुधी = बुद्धिमान । गहवर = प्रेमपूर्ण । भीर = दुःख । भावार्थ—रे जीव ! अब भी अपने और रामजीके करतबोंको समझनेसे तेरी भलाई हो सकती है। कहाँ तू है और कहाँ कोशलधनी श्रीरामजी ! फिर भी तुझे सब लोग क्या कहते हैं (यही न, कि तू रामका दास है) ? ॥१॥ रामजीने कब तुझपर प्रसन्न होकर कृपा की है और कब खीझकर तुझे गालियाँ दी हैं ? जरा (विवेकरूपी) दर्पणमें अपना मुँह तो देख; उसके बाद उसपर अच्छी तरह विचार करके हृदयमें हार मान ले—लज्जित हो जा (क्योंकि विचार करनेपर तुझे मालूम हो जायगा कि रामजी तुझपर सदासे कृपा करते आ रहे हैं, पर तू घोर अपराधी है, किन्तु विचार करनेके बाद तू यह न समझ ले कि तेरा सुधार ही न होगा ॥२॥ अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई बातें सुधारनेमें उन्हें आधा पल