विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
३२६ विनय-पत्रिका भी नहीं लगता । 'हे कृपानिधि ! मेरी रक्षा कीजिये' - प्रेमके साथ इतना कहते ही ऐसा कौन (पापी) है जिसे रामजीने साधु नहीं बना दिया ? ॥३॥ वाल्मीकि और निषादकी कथा तथा बन्दर (सुग्रीव, हनुमान् , अंगदादि), भील (शवरी), भालु (जाम्बवान) आदिके सम्मानका हाल सुनकर भी जो रामजीके सम्मुख न हुआ, उसे भला कौन ज्ञानका उपदेश कर सकता है ? ॥४॥ सुग्रीवने कौनसी बड़ी सेवा की थी, और कौनसी प्रीतिकी रीति निबाही थी जिसके भाई बालिको व्याधकी तरह मार डाला ? वह बात सुनकर किसीको अच्छी नहीं लगती ॥५॥ विभीषणने ही कौनसा भजन किया था ? किन्तु रामजीने उसे क्या फल दिया ? गरीबनिवाज श्रीरामजीको रक्षा करनेके वचनकी बड़ी लाज है ॥६॥ इसलिए तू रघुनाथजीका ही नाम जपा कर, दूसरी चर्चा न चला । क्योंकि वह सुन्दर हैं, सुखदायी हैं, स्वामी हैं, बुद्धिमान हैं, समर्थ हैं, कृपालु हैं और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं ॥७॥ ऐसा कौन है जिसने आँखोंमें आँसू भरकर, प्रेमपूर्ण मनसे तथा पुलकित शरीर होकर गद्गदवाणीसे श्रीरामजीके गुणोंको गाया और उसका सांसारिक दुःख दूर नहीं हुआ ? ॥८॥ प्रभुजी कृतज्ञ हैं, सर्वज्ञ हैं, अतः तू पिछली ग्लानि छोड़ दे। ऐ तुलसी ! रामजीसे तेरी कुछ नयी जान-पहचान नहीं है ॥९॥ विशेष १- 'रीझि निवाज्यौ कबहिं तू' - इसका एक अर्थ यह भी है कि 'तूने रीझकर कब (रामजीको) रहम किया' । [ १९४ ] जो अनुराग न राम सनेही सों । तौ लह्यो लाहु कहा नर-देही सों ॥१॥ जो तनु धरि, परिहरि सब सुख, भये सुमति राम-अनुरागी । सो तनु पाइ अघाइ किये अघ, अवगुन-उदधि अभागी ॥२॥ ग्यान-बिराग, जोग-जप, तप-मख, जग मुद-मग नहिं थोरे । राम-प्रेम बिनु नेम जाय जैसे मृग-जल-जलधि-हिलोरे ॥३॥
विनय-पत्रिका ३२७ लोक विलोकि, पुरान-वेद सुनि, समुझि बूझि गुरु-ग्यानी। प्रीति-प्रतीति राम-पद-पंकज सकल-सुमंगल खानी ॥४॥ अजहुँ जानि जिय, मानि हारि हिय, होइ पलक महँ नीको। सुमिरु सनेह सहित हित रामहिं, मानु मतो तुलसी को ॥५॥ शब्दार्थ—अघाइ = भरपेट। मख = यज्ञ। मग = मार्ग। मतो = राय, सिद्धान्त। भावार्थ—यदि स्नेही रामजीसे अनुराग नहीं है, तो मनुष्य-शरीर धारण करनेसे क्या लाभ हुआ? ॥१॥ जो शरीर धारण करके अच्छी बुद्धिवाले (ज्ञानीजन) सब सुखोंको त्यागकर रामके प्रेमी बने हैं, ऐ अवगुणोंका समुद्र, अभागा! वही शरीर पाकर तूने पेट भरकर पाप किये हैं ॥२॥ संसारमें ज्ञान, वैराग्य, योग, जप, तप, यज्ञ आदि आनन्दके मार्ग थोड़ेसे नहीं हैं; किन्तु राम- प्रेमके बिना ये सब नेम वैसे ही व्यर्थ हैं जैसे मृगजलके समुद्रकी लहरें ॥३॥ संसारको देखकर, पुराणों और वेदोंको सुनकर तथा ज्ञानी गुरुओंसे समझ-बूझकर रामजीके चरण-कमलोंमें प्रेम और विश्वास होना ही सब कल्याणोंकी खानि है ॥४॥ अब भी यदि तू अपने दिलमें यह समझकर हृदयमें हार मान ले, तो पलभरमें तेरा भला हो सकता है। तुलसीदासका मत मानकर तू अपने हितके लिए स्नेहके साथ श्रीरामजीका स्मरण कर ॥५॥ विशेष १—'राम-प्रेम बिनु नेम जाय'—इसपर महात्मा कबीरने भी खूब कहा है:— मन न रँगाये, रँगाये जोगी कपरा। आसन मारि मन्दिरमें बैठे, राम नाम छाँड़िके पूजन लागे पथरा। मथवा मुड़ाय जोगी जटवा बढ़वले दढ़िया बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा ॥ जंगलमें जोगी धूनी रमवले कामके जराय जोगी होइ गैले हिंजरा। मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रँगावै, गीता-पोथी बाँचिके होइ गैले लबरा ॥ कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, जमके दुवारे बाँधल जैबे पकरा ॥ ( १९५ ) बलि जाउँ हौं राम गुसाईं कीजै कृपा अपनी नाईं ॥१॥
३२८ विनय-पत्रिका परमारथ सुरपुर-साधन सब स्वारथ सुखद भलाई। कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई ॥२॥ जहँ जहँ चित चितवत हित, तहँ नित नव विषाद् अधिकाई। रुचि-भावती भभरि भागहिं, समुहाहिं अमित अनभाई ॥३॥ आधि-मगन मन, व्याधि-विकल तन, वचन मलीन झुठाई। एतेहुँ पर तुमसों तुलसी की प्रभु सकल सनेह सगाई ॥४॥ शब्दार्थ-सुरपुर = देवलोक, स्वर्ग । विषाद् = दुःख । भभरि = डरकर । अनभाई = बुरी । भावार्थ—हे राम गुसाइँ ! मैं आपपर बलि जाता हूँ, आप अपने स्वभावके अनुकूल मुझपर कृपा कीजिये ॥१॥ परमार्थके, स्वर्गके साधनोंको एवं सुख देने- वाले और भलाई करनेवाले इहलौकिक स्वार्थोंको तथा सुन्दर चालोंको इस कलियुगने क्रोधके साथ अपनी कठिन कुचालें चलाकर लोप कर दिया है ॥२॥ यह मन जहाँ-जहाँ अपना हित देखता है, वहाँ-वहाँ नित्य नये दुःखोंकी अधिकता है । रुचिको अच्छी लगनेवाली बात डरकर भाग जाती है, और रुचिके प्रतिकूल अगणित वस्तुएँ सामने आती हैं ॥३॥ मन चिन्ता-मग्न हो रहा है, शरीर रोगसे विकल है और वाणी झुठाईके कारण मलिन हो रही है । हे प्रभो ! इतनेपर भी इस तुलसीदासका सब सम्बन्ध और स्नेह आपहीके साथ है ॥४॥ ( १९६ ) काहे को फिरत मन, करत बहु जतन, मिटै न दुख विमुख रघुकुल-वीर । कीजै जो कोटि उपाइ, त्रिबिध ताप न जाइ, कह्यो जो भुज उठाय मुनिवर कीर ॥१॥ सहज टेव विसारि तुही धौं देखु बिचारि, मिलै न मथत वारि घृत बिनु छीर । समुझि तजहि भ्रम, भजहि पद-जुगम, सेवत सुगम, गुन गहन गंभीर ॥२॥
विनय-पत्रिका ३२९ आगम निगम ग्रंथ, रिषि-मुनि, सुर-संत, सबही को एक मत सुनु, मतिधीर । तुलसिदास प्रभु बिनु पियास मरै पसु, जद्यपि है निकट सुरसरि - तीर ॥३॥ शब्दार्थ—कीर = शुकदेवजी । टेव = आदत । छीर = दूध । आगम = शास्त्र । निगम = वेद । सुरसरि = गंगाजी । भावार्थ—रे मन, तू बहुतसे उपाय क्यों करता फिरता है ? तू रघुवंश-वीर श्रीरामजीसे विमुख है, अतः तेरे दुःख दूर नहीं हो सकते । महामुनि शुकदेवजीने हाथ उठाकर (श्रीमद्भागवतमें) यह बात कही है कि करोड़ों उपाय क्यों न करो, (ईश्वर-विमुख रहनेपर) दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों प्रकारके ताप नहीं जा सकते ॥१॥ अपने सहज स्वभावको भूलकर तू ही विचारकर देख न, कहीं बिना दूधके केवल पानी मथनेसे घी मिलता है ? यही समझकर तू भ्रमको छोड़ दे और उन युगल चरणोंको भज, जो सेवा करनेमें सुगम हैं और गुण-गाम्भीर्यमें गहन हैं ॥२॥ रे मन ! सुन, वेद-शास्त्र आदि ग्रन्थोंका, तथा ऋषि-मुनियों, देवताओं, सन्तों एवं और भी जितने शान्त बुद्धिवाले हैं, उन सबका यह एक ही मत है । रे पशु तुलसीदास ! यद्यपि (राम-नामरूपी) गंगाजीका तट निकट है, फिर भी तू प्रभुके बिना प्यासा मर रहा है ॥३॥ विशेष १—'गुन गहन गँभीर'—गोस्वामीजीने अन्यत्र भी यही बात लिखी है— उमा राम-गुन गूढ़, पंडित मुनि पावहिं विरति । पावहिं मोह बिमूढ़, जे हरिविमुख न धर्म-रति ॥ —रामचरितमानस [ १९७ ] नाहिंन चरन-रति, ताहि तें सहौं विपति, कहत श्रुति सकल मुनि मतिधीर । बसै जो ससि-उछंग सुधा-स्वादित कुरंग, ताहि क्यों भ्रम निरखि रबिकर-नीर ॥१॥
३३० विनय-पत्रिका सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अग्यान, पढ़िय न समुझिय जिमि खग कीर । बझत बिनहिं पास सेमर-सुमन-आस, करत चरत तेइ फल बिनु हीर ॥२॥ कछु न साधन-सिधि, जानौं न निगम-विधि, नहिं जप-तप बस मन न समीर। तुलसिदास भरोस परम करुना-कोस, प्रभु हरिहैं विषम भवभीर ॥३॥ शब्दार्थ — उछंग = गोद। कीर = तोता। पास = पाश, जाल। चरत = चोंच मारता है, चरता है। हीर = गूदा। भावार्थ—श्रीरामजीके चरणोंमें मेरी प्रीति नहीं है, इसीसे दुःख सह रहा यह बात वेदों और धीर बुद्धिवाले समस्त मुनियोंने कही है। क्योंकि जो चन्द्रमाकी गोदमें रहकर अमृतका स्वाद लेता है, उसे मृगजलमें क्यों होने लगा ? (तात्पर्य यह कि जैसे जंगली हरिणको मृगजलका भ्रम होत पर जो हरिण चन्द्रमाका वाहन है और अमृतपान करता है, वह मृगतृ नहीं भूल सकता, उसी प्रकार ईश्वरसे विमुख प्राणियोंको संसारकी सत्त विश्वास होनेके कारण अनेक दुःख झेलने पड़ते हैं; पर हरिभक्तोंको उसका नहीं होता, क्योंकि वे जानते हैं कि यह संसार मिथ्या है) ॥१॥ जैसे पक्षी पढ़ता तो है, पर समझता कुछ नहीं, उसी प्रकार अनेक पुराणोंके रहनेपर भी मेरा अज्ञान दूर नहीं होता। मूर्ख तोता सेमरके फूलकी आ करता है और बिना गूदेके उस फलमें चोंच मारता है; इस भाँति वह जालके ही फँस जाता है (वैसे ही मनुष्य निस्तत्त्व सांसारिक विषयोंमें आस होकर अपने अज्ञानसे बँध जाता है) ॥२॥ न तो मुझमें कोई साधन है न सिद्धि ही; वैदिक विधियोंको भी मैं नहीं जानता। न मैंने जप, तप एवं म वशमें किया है, और न प्राण-वायुपर ही अधिकार जमाया है। इस तुल दासको तो बहुत बड़ा भरोसा है कि करुणाके भण्डार श्रीरामजी इसकी घ सांसारिक वेदना हर लेंगे ॥३॥
विनय-पत्रिका ३३१ राग भैरवी [ १९८ ] मन पछितैहै अवसर बीते । दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु ही ते ॥१॥ सहसबाहु, दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते । हम-हम करि धन-धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते ॥२॥ सुत-बनितादि जानि स्वारथरत, न करु नेह सबही ते । अन्तहुँ तोहिं तजैंगे पामर ! तू न तजै अबही ते ॥३॥ अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते । बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ विषय-भोग बहु घी ते ॥४॥ शब्दार्थ—ही = हृदय, मन । धाम = घर । रीते = खाली हाथ । पामर = नीच । भावार्थ—रे मन ! अवसर बीत जानेपर तुझे पछताना पड़ेगा । दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर कर्म, वचन और हृदयसे भगवान्के चरणोंका भजन कर॥१॥ सहस्रबाहु और रावण आदि (महा तेजस्वी) राजा भी बलवान कालसे नहीं बचे, जो 'हम-हम' करते हुए धन-धाम सँभालनेमें लगे रहे; पर अन्तमें खाली हाथ (इस संसारसे) उठकर चले गये ॥२॥ पुत्र, स्त्री आदिको स्वार्थरत जानकर इन सबसे स्नेह न कर । रे नीच ! ये सब तुझे अन्तमें छोड़ देंगे; इसलिए तू अभीसे इन्हें क्यों नहीं छोड़ देता ? ॥३॥ रे मूर्ख ! अब जाग, सारी दुराशाओंको हृदयसे छोड़ दे, और भगवान्से प्रेम कर । रे तुलसी ! भला कहीं कामरूपी अग्नि विषय-भोगरूपी बहुत-सा घी डालनेसे बुझती है ? ॥४॥ विशेष १—'अन्त चले'—इसपर कबीरदासके शब्दोंका भी रसास्वादन कर लीजिये:— जियरा जाहुगे हम जानी ॥ राज करंते राजा जैहैं रूप करंते रानी । चाँद भी जैहै सूरज भी जैहै, जैहै पवन औ पानी ॥
३३२ विनय-पत्रिका मानुष जन्म महा अति दुर्लभ, तुम समझो अभिमानी। लोभ नदीकी लहर बहुतु है, बूड़ोगे बिनु पानी ॥ जोगी जैहैं जंगम जैहैं औ जैहैं बड़ ज्ञानी। कहै कबीर एक सन्त न जैहैं जाको चित ठहरानी ॥ [ १९९ ] काहे को फिरत मूढ़ मन धायो । तजि हरि-चरन-सरोज सुधारस, रविकर-जल लय लायो ॥१॥ त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो । गृह, बनिता, सुत, बंधु भये बहु, मातु पिता जिन्ह जायो ॥२॥ जाते निरय-निकाय निरंतर, सोइ इन्ह तोहि सिखायो । तुव हित होइ, कटै भव-बंधन, सो मग तोहि न बतायो ॥३॥ अजहुँ बिषय कहँ जतन करत, जद्यपि बहु विधि डहँकायो । पावक-काम भोग-घृत तें सठ, कैसे परत बुझायो ॥४॥ बिषय हीन दुख, मिले बिपति अति सुख सपनेहुँ नहिं पायो । उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यों धन दुखप्रद श्रुति गायो ॥५॥ छिन-छिन छीन होत जीवन, दुर्लभ तनु वृथा गँवायो । तुलसिदास हरि भजहि आस तजि, काल-उरग जग खायो ॥६॥ शब्दार्थ—त्रिजग = तिर्यक् (पशुपक्षी) । निरय = नरक । निकाय = समूह । डहँकायो = ठगा गया । प्रेत-पावक = प्रेतकी आग । भावार्थ—रे मूढ़ मन ! तू किसलिए दौड़ता फिर रहा है ? भगवच्चरणा- रविन्दके सुधारसको छोड़कर तूने मृगतृष्णाके जलमें लगन लगा रखी है ॥१॥ पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, राक्षस एवं संसारमें और जितनी योनियाँ हैं, सबमें तू घूम आया । बहुतसे घर, स्त्री, पुत्र, भाई तथा तुझे उत्पन्न करनेवाले माता- पिता हुए ॥२॥ किन्तु इन सबने तुझे वही सिखाया जिससे तेरे लिए नरक-समूह निरन्तर बना रहे (तुझे नरकोंमें ही रहना पड़े); ऐसा मार्ग इन सबने तुझे नहीं बताया जिससे तेरा हित हो, और संसार-बन्धन कट जाय ॥३॥ यद्यपि तू अनेक तरहसे ठगा गया, फिर भी तू अभीतक विषयोंके ही लिए यत्न कर रहा
है। किन्तु रे दुष्ट ! कामरूपी अग्निमें भोगरूपी घी डालते रहनेसे वह कैसे बुझेगी ? ॥४॥ विषयोंके साधनसे रहित होनेमें भी दुःख हुआ और विषयोंके मिल जानेपर तेरी भारी विपत्ति हुई; तुझे तो स्वप्नमें भी सुख नहीं मिला। इसलिए वेदोंने विषयरूपी धनको दोनों ही प्रकारसे भूतके लुककी तरह दुःखप्रद कहा है; (तात्पर्य यह कि विषयी पुरुषोंको न तो विषयकी प्राप्तिमें ही सुख मिलता है और न अप्राप्तिमें ही) ॥५॥ क्षण-प्रति-क्षण तेरा जीवन क्षीण होता जा रहा है, तूने इस दुर्लभ शरीरको व्यर्थ ही खो दिया। ऐ तुलसीदास ! तू सब आशाओं- को छोड़कर हरिभजन कर। देख, कालरूपी सर्प संसारको खाये जा रहा है ॥६॥ [ २०० ] ताँवे सो पीठि मनहुँ तन पायो । नीच, मीच जानत न सीस पर, ईस निपट बिसरायो ॥१॥ अवनि-रवनि, धन-धाम, सुहृद-सुत, को न इन्हहिं अपनायो ? काके भये, गये सँग काके, सब सनेह छल-छायों ॥२॥ जिन्ह भूपनि जग-जीति, बाँधि जम, अपनी बाँह वसायो । तेऊ काल कलेऊ कीन्हें, तू गिनती कव आयो ॥३॥ देखु विचारि, सार का साँचो, कहा निगम निजु गायो । भजहि न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि, जेहि महेस मन लायो ॥४॥ शब्दार्थ—निपट = बिलकुल । रवनि = रमणी । छायो = भरा हुआ है। निजु = यथार्थतः । भावार्थ—मानो तूने ताँबेसे मढ़ा हुआ शरीर पाया है। (अर्थात् तूने इस नश्वर शरीरको अजर-अमर समझ लिया है) । रे नीच ! तू नहीं जानता कि मौत तेरे सिरपर (खड़ी) है, फिर भी तूने परमात्माको बिलकुल ही भुला दिया है ॥१॥ पृथिवी, स्त्री, धन, मकान, सुहृद् और पुत्र इन सबको किसने नहीं अपनाया ? (अर्थात् सबने अपनाया)। किन्तु ये किसके हुए ? किसके साथ गये ? यह सब स्नेह छलसे भरा हुआ है ॥२॥ जिन राजाओंने संसारको जीतकर अपनी भुजाओंके बलसे यमराजको बाँधकर अधीन कर लिया था, उन्हें भी जब प्रबल काल कलेवा कर गया, तो तू किस गिनतीमें है ॥३॥ विचार कर देख, सच्चा तथ्य
३३४ विनय-पत्रिका क्या है, वेदोंने यथार्थतः क्या कहा है। हे तुलसी ! अब भी तू सोच-समझकर उसे नहीं भज रहा है, जिसमें भगवान् शंकरजीने अपना मन लगा रखा है ॥४॥ विशेष १—‘अवनि······अपनायो’—किन्तु इनके अपनानेसे क्या हुआ ? देखिये इसपर गुसाईंजी क्या कहते हैं— झूमत द्वार अनेक मतङ्ग जँजीर जरे मद अम्बु चुचाते। तीख तुरङ्ग मनोगति चञ्चल पौनके गौनहु ते बढ़ि जाते ॥ भीतर चन्द्रमुखी अवलोकति बाहर भूप खड़े न समाते। ऐसे भये तौ कहा तुलसी जो पै जानकीनाथके रङ्ग न राते ॥ [ २०१ ] लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहुँ कवहूँक घटत न काज पराये ॥१॥ जो सुख सुरपुर-नरक, गेह-बन आवत बिनहिं बुलाये। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन, समुझत नहिं समुझाये ॥२॥ पर-दारा, पर-द्रोह, मोह वस किये मूढ़ मन भाये। गरभबास दुखरासि जातना तीव्र बिपति बिसराये ॥३॥ भय-निद्रा, मैथुन-अहार, सबके समान जग जाये। सुर-दुर्लभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गँवाये ॥४॥ गई न निज-पर-बुद्धि, सुद्ध ह्वै रहे न राम-लय लाये। तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनिके पछिताये ॥५॥ शब्दार्थ—मैथुन = स्त्रीप्रसंग। जाये = जन्म लिया है। लय = प्रीति, ध्यान। भावार्थ—मनुष्य-शरीर पानेसे क्या लाभ हुआ, यदि वह शरीर, वचन और मनसे स्वप्नमें भी कभी दूसरोंके काम नहीं आया ॥१॥ जो सुख स्वर्ग, नरक, घर और वनमें बिना बुलाये ही आ जाता है, उस सुखके लिए रे मन ! तू बहुत-से यत्न करता है और समझानेपर भी नहीं समझता ॥२॥ हे मूढ़ ! तूने मोहवश होकर दूसरेकी स्त्रीके लिए और दूसरोंसे वैर करनेके लिए मनमाने काम
विनय-पत्रिका ३३५ किये। तूने गर्भवासके महान् दुःख, तीव्र यातना और विपत्तिको भुला दिया; तभी तो ऐसा कर रहा है ! यदि उस कष्टकी तुझे जरा भी सुध होती तो क्या तू फिर वही यंत्रणा भोगनेका काम करता ? (कभी नहीं) ॥३॥ यों तो संसारमें जिसने जन्म लिया है, सबमें भय, निद्रा, मैथुन, आहार आदि एक-से हैं; किन्तु तूने देवताओंके लिए दुर्लभ मानव-शरीर धारण करनेपर भी ईश्वर-भजन नहीं किया, मद और अभिमानमें चूर होकर उसे खो दिया (ऐसी दशामें तुझमें और संसारके इतर-प्राणियोंमें अन्तर ही क्या रहा ?) ॥४॥ यदि अपने-परायेकी बुद्धि न गयी, और शुद्ध भावसे रामजीमें प्रीति न की, तो तुलसीदास कहते हैं कि यह अवसर बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या (लाभ) होगा ? ॥५॥ विशेष १—'भय निद्रा ॰॰॰॰जाये'—इस विषयमें लिखा है- 'आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥ —महाभारत, शान्तिपर्व अर्थात् आहार, निद्रा, भय और मैथुन, मनुष्यों और पशुओंके लिए समान ही स्वाभाविक है। उनमें भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन्हें मर्यादित करनेका) । इस धर्मसे हीन मनुष्य पशुके समान ही है। [ २०२ ] काजु कहा नरतनु धरि साध्यो । पर-उपकार सार स्रुति को जो, सो धोखेहु न विचार्यो ॥१॥ द्वैत मूल, भय-सूल, सोक-फल, भवतरु टरैं न टाऱ्यो । राम भजन-तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निबाऱ्यो ॥२॥ संसय-सिंधु नाम-बोहित भजि निज आतमा न ताऱ्यो । जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हाऱ्यो ॥३॥ देखि आनकी सहज सम्पदा द्वेष-अनल मन-जाऱ्यो । सम, दम, दया दीन-पालन, सीतल हिय हरि न सँभाऱ्यो ॥४॥
३३६ विनय-पत्रिका प्रभु गुरु पिता सखा रघुपति तैं मन क्रम बचन बिसारयो । तुलसिदास यहि आस, सरन राखिहि जेहि गीध उबारयो ॥५॥ शब्दार्थ- कुठार = कुल्हाड़ी । आनकी = दूसरेकी । अनल = आग । भावार्थ-मनुष्य-शरीर धारण करके तूने कौन-सा काम पूरा किया ? जो परोपकार वेदोंका सार या निचोड़ है, उसपर तूने भूलकर भी विचार नहीं किया (करना तो दूर रहा) ॥१॥ यह संसार वृक्षके समान है; द्वैतभाव (अर्थात् देहको आत्मा मानना) इस संसार-वृक्षकी जड़ है, भय ही चुभनेवाले काँटे हैं और शोक ही फल हैं। यह वृक्ष हटानेसे नहीं हट सकता । यह तो केवल राम-भजनरूपी तेजधारकी कुल्हाड़ी लेकर काटनेसे कटता है, सो तूने उसे नहीं काटा ॥२॥ संशय-समुद्रसे पार होनेके लिए नामरूपी नौकाका सेवन कर । तूने अपनी आत्माका उद्धार नहीं किया । तू अनेक जन्मतक विवेकहीन होकर नाना योनियोंमें घूमनेपर भी न थका ॥३॥ दूसरोंकी सहज सम्पत्ति देखकर तू अपने मनको द्वेषकी आगमें जलाता रहा; किन्तु शम, दम, दया और गरीबोंका पालन करते हुए शीतल हृदयसे परमात्माकी सेवा नहीं की ॥४॥ तूने मन, कर्म और वचनसे अपने प्रभु, गुरु, पिता और सखा श्री रघुनाथजीको भुला दिया । किन्तु तुलसीदासको यही इतनी आशा है कि जिसने गीधको उबारा है, वह मुझे भी अपनी शरणमें रख लेंगे ॥५॥ विशेष १--'पर-उपकार सार श्रुतिको'--आचार्योंने परोपकारके समान दूसरा धर्म और दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेके समान दूसरा एक भी पाप नहीं माना है । कहा भी है-- अष्टादश पुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ भर्तृहरिने भी कहा है-- 'स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः । अर्थात् परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है । २--'गीध'--११५ वें पदके विशेषमें देखिये ।
विनय-पत्रिका ३३७ [२०३] श्री हरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान। जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवान ॥१॥ परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलत अति दूरि। जद्यपि निकट हृदय निज रहें सकल भरिपूरि ॥२॥ दुइज द्वैत-मति छाँड़ि चरहि महि-मण्डल धीर। विगत मोह-माया-मद हृदय बसत रघुबीर ॥३॥ तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुन्द। गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द ॥४॥ चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित अहंकार। विमल बिचार परम पद निज सुख सहज उदार ॥५॥ पाँचइ पाँच परस, रस, सब्द, गन्ध अरु रूप। इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥६॥ छठ षटबरग करिय जय जनक-सुता-पति लागि। रघुपति-कृपा-वारि बिनु नहिं बुताइ-लोभागि ॥७॥ सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय विचार। तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥८॥ आठइँ आठ प्रकृति-पर निरविकार श्रीराम। केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम ॥९॥ नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह। ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारुन दुख लीन्ह ॥१०॥ दसइँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि। साधन वृथा होइ सब मिलहिं न सारँगपानि ॥११॥ एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ। सोइ व्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥१२॥ द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रैलोक। परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥१३॥ २२
३३८ विनय-पत्रिका तेरसि तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवन्त । मन-क्रम-बचन अगोचर, व्यापक, व्याप्य, अनन्त ॥१४॥ चौदसि चौदह भुवन अचर - चर - रूप गोपाल । भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल ॥१५॥ पूनो प्रेम - भगति - रस हरि - रस जानहिं दास । सम, सीतल, गत-मान, ग्यानरत, बिषय - उदास ॥१६॥ त्रिविध सूल होलिय जरै, खेलिय अब फागु । जो जिय चहसि परम सुख, तौ यहि मारग लागु ॥१७॥ श्रुति-पुरान - बुध - सम्मत चाँचरि चरित मुरारि । करि बिचार भव तरिय, परिय न कबहुँ जमधारि ॥१८॥ संसय-समन, दमन दुख, सुखनिधान हरि एक । साधु कृपा बिनु मिलहिं न, करिय उपाय अनेक ॥१९॥ भवँसागर कहँ नाव सुद्ध संतनके चरन । तुलसिदास प्रयास बिनु मिलहिं राम दुखहरन ॥२०॥ शब्दार्थ—चरहि = विचरण कर । त्रिगुन = सत्व, रज, तम । श्रीरमन = लक्ष्मीकान्त । मुकुन्द = विष्णु । षटबरग = शरीरके भीतर स्थित परलोक विरोधी शत्रुओंका समूह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि । लीन्ह = ले लिया, खरीद लिया । सारँगपानि = हाथमें धनुष धारण करनेवाले रामचन्द्र । गोपाल = श्रीकृष्ण । अति = जड़से । गत-मान = अहंकार- रहित । उदास = उदासीन । चाँचरि = होलीके गीत । भावार्थ—हे मन ! तू अभिमानको छोड़कर श्रीहरिरूप गुरुके उन चरण- कमलोंका भजन कर, जिनकी सेवा करनेसे आनन्दके भण्डार भगवान् हरि मिलते हैं ॥१॥ फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाकी तरह सबसे पहले प्रेमके बिना रामजीका मिलना बहुत दूर है (अर्थात् जैसे पहली तिथि प्रतिपदा है, उसी तरह भगवत्प्राप्तिके लिए पहली वस्तु प्रेम है) यद्यपि रामजी अपने हृदयमें निवास करते हैं तथापि प्रेमके बिना उनका मिलना कठिन है ॥२॥ दूजके समान दूसरा साधन यह है कि द्वैत-बुद्धि छोड़कर धीर भावसे भू-मण्डलपर विचरण कर ; मोह, माया और मदसे रहित हृदयमें ही श्रीरघुनाथजी निवास करते हैं (इसलिए तू इन विकारोंको छोड़ दे) ॥३॥ तीजके समान तीसरा साधन यह है कि सत्व-
विनय-पत्रिका ३३९ रज-तम इन तीन गुणोंसे परे परमपुरुष लक्ष्मीकान्त मुकुन्द भगवान्का परमानन्द (स्वरूपानन्द) गुण-स्वभावका त्याग किये बिना दुर्लभ है । ब्रह्म साक्षात्कार करनेके लिए गुणोंका त्याग करना आवश्यक है ॥४॥ चौथके समान चौथा उपाय है मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारका त्याग करना (अर्थात्, तादात्म्य भाव त्याग कर अन्तःकरणका द्रष्टा बन जाना चाहिये) । इनका त्याग करनेके बाद विमल विचार उत्पन्न होकर आत्मानन्दरूप परम पदको प्राप्त होना सहज हो जाता है ॥५॥ पंचमीकी तरह पाँचवाँ उपाय यह है कि पंच ज्ञानेन्द्रियोंके जो पाँच विषय हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं, उनका कहना न मान, नहीं तो संसाररूपी कुएँमें गिर जायगा ॥६॥ छठकी तरह छठा उपाय यह है कि जानकी-वल्लभ श्रीरामजीकी प्राप्तिके लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरपर विजयलाभ करना चाहिये । लोभरूपी आग ईश्वरीय कृपारूपी जलके बिना नहीं बुझती (अर्थात् लोभ बड़ा ही प्रबल है, अतः मन, वचन, कर्मसे ऐसा काम करना चाहिए जिसमें इसपर जय प्राप्त हो सके और तुझपर भगवान् की कृपा हो) ॥७॥ सप्तमीके समान सातवाँ यत्न यह है कि सात धातुओं (त्वचा- रक्त, मांस, हड्डी, मज्जा, मेद, शुक्र) से बने हुए शरीरका विचार करना चाहिये । अर्थात् यह समझना चाहिये कि यह शरीर नाशवान् है, इसे काम-क्रोधादिके वशमें नहीं होने देना चाहिये । इस शरीरका एक ही फल है; वह यह कि परोप- कार करो ॥८॥ अष्टमीके समान आठवाँ साधन यह है कि षट्-विकार-रहित श्रीरामजी अष्ट प्रकृतिसे परे हैं, अतः यह जानना चाहिये कि जबतक हृदयमें अनेक तरहकी कामनाएँ बस रही हैं, तबतक वह प्रभु किस तरह मिल सकते हैं ? तात्पर्य यह है कि इच्छाओंका त्याग करना चाहिये ॥९॥ नौमीके समान नवाँ साधन यह है कि नौ दरवाजेकी इस पुरी (शरीर)में बसकर जिसने अपना भला न किया, वह आदमी अनेक योनियोंमें भटकता फिरता है। उसे समझ लेना चाहिये कि मैंने दारुण दुःख खरीद लिया ॥१०॥ दशमीके समान दसवाँ उपाय यह है कि दसों इन्द्रियों (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय और पञ्च कर्मेन्द्रिय) का संयम करना चाहिये । जो न कर सके, उसे अपने हृदयमें समझ लेना चाहिये कि सब साधन व्यर्थ हुए और सारंग-पाणि भगवान् रामचन्द्रजी न मिलेंगे ॥११॥ एकादशीके समान ग्यारहवाँ साधन यह है कि मनको वशमें करके केवल उस एक निःसंग,
७. प्रेम-प्रार्थना एवं राम-नाम महिमा
३४० विनय-पत्रिका शुद्ध-बुद्ध आनन्दघन परमात्माकी ही सेवा करनी चाहिये। जो आदमी ऐसा करता है, वही इस एकादशीके व्रतका फल पाता है, और उसका आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा हो जाता है॥१२॥ द्वादशीके समान बारहवाँ साधन यह है कि ऐसा दान दो कि जिससे तीनों लोकोंमें कोई भय न रह जाय। परोपकार- में रत रहना ही (एकादशी व्रतके बाद द्वादशीका) वह पारण है जिससे फिर कभी शोक नहीं व्यापता ॥१३॥ तेरसके समान तेरहवाँ यत्न यह है कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओंको त्यागकर भगवान्का भजन करना चाहिये। क्योंकि वह मन, कर्म और वाणीसे परे हैं—इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं— सबमें व्याप्त हैं और स्वयं ही व्याप्य हैं (अर्थात् व्याप्य और व्यापक दोनों वही हैं) तथा अनन्त हैं ॥१४॥ चतुर्दशीके समान चौदहों भुवनोंमें चर और अचर- रूप भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं; किन्तु भेदभाव (मेरा-तेरा) दूर हुए बिना रघुनाथ- जी संसारके गहन जालको नहीं काटते। तात्पर्य यह है कि 'मेरा-तेरा' भाव दूर करो, तंव ईश्वर-कृपा होगी ॥१५॥ पूर्णिमाके समान पन्द्रहवाँ साधन यह है कि सिद्धा प्रेमा भक्तिका रस है (इस रसका आविर्भाव तब होता है, जब ऊपर कहे हुए सब साधन सम्पन्न हो जाते हैं)। इस भगवद्दर्शनरूपी रसको केवल ईश्वरके वे अनन्य भक्त जानते हैं, जो समदर्शी, शीतल (शान्त), अहंकार-रहित, ज्ञान-रत तथा सब विषयोंसे उदासीन हैं ॥१६॥ (गुसाईंजीने मनुष्योंके कल्याणके लिए पहले प्रेम, साधन और भक्तिका उल्लेख किया है और अन्तमें अनेक साधनोंके द्वारा उसे सिद्धाभक्तितक पहुँचा दिया है। फागुनकी पूर्णिमा और चैत्रकी प्रतिपदाके सन्धिकालमें होलिकादहन होता है; अतः वहाँ सांसारिक भाव- के नाश और परमात्माके दर्शनकी उत्सुकताके बीचका समय ही सन्धिकाल है। उसी सन्धिकालमें पूर्णिमाके समान सिद्धाभक्तिकी) होलीमें दैहिक, दैविक और भौतिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंको जलाकर अच्छी तरह फाग खेलना चाहिये (आनन्द मनाना चाहिये)। यदि तू अपने हृदयमें परमानन्द चाहता है, तो इस मार्गपर चल (ऊपर कहे हुए पन्द्रह साधनोंको क्रम-क्रमसे साध) ॥१७॥ वेदों, पुराणों और पण्डितोंसे सम्मत परमात्माके चरित ही होलीके गीत हैं। इसपर विचार करके संसारसे तर जाना चाहिये और फिर कभी यमदूतोंके फेरमें नहीं पड़ना चाहिये ॥१८॥ संशयोंका नाश करनेवाले,
विनय-पत्रिका ३४१ दुःखोंको दूर करनेवाले और आनन्द-निधान केवल भगवान् ही हैं। किन्तु वह (रामजी) साधुओंकी कृपा हुए बिना नहीं मिल सकते—चाहे कितने ही उपाय क्यों न करो ॥१९॥ संसार-सागरसे पार होनेके लिए सन्तोंका पवित्र चरण ही नाव है। तुलसीदास कहते हैं कि (सन्तोंके चरणरूपी नावके सहारे अर्थात् सन्तोंकी चरण-सेवा करके) दुःखोंको हरनेवाले श्रीराम बिना परिश्रम ही मिल जाते हैं ॥२०॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें बड़ा ही उपदेशप्रद रूपक बाँधा है। इसमें उन्होंने सिद्धाभक्ति प्राप्त होनेतककी अवधिको ही एक पक्ष माना है। पक्षमें पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, अतः यहाँ भी क्रमशः पन्द्रह साधनोंका उल्लेख है। 'त्रिविध सूल'की होली भी खूब जलायी गयी है। चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ हैं। एक-एक तिथिमें एक-एक कलाकी वृद्धि होती है। ठीक इसी तरह काम- शास्त्रमें सोलह कलाओंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं— ‘पूषा यशा सुमनसा रतिः प्राप्तिस्तथा धृतिः। ऋद्धिः सौम्या मरीचिञ्च तथा चैवांशुमालिनी ॥ अंगिरा शशिनी चेति छाया सम्पूर्णमंडला । तुष्टिश्चैवामृता चेति कलाः सोमश्च षोडश ॥’ भक्तवर वैजनाथजीने जीवकी भी षोडश कलाओंका उल्लेख किया है— ‘निराशा, सद्वासना, कीर्ति, जिज्ञासा, करुणा, मुदिता, स्थिरता, सुसङ्ग, उदासीनता, श्रद्धा, लज्जा, साधुता, तृप्ति, क्षमा, विवेक, विद्या।' २—‘द्वैत-मति'—जीव और ईश्वरको भिन्न समझनेवाली बुद्धि । ३—'मुकुन्द'—का अर्थ है 'मुक्तिदाता' अर्थात् विष्णु । ब्रह्मवैवर्तके श्रीकृष्णजन्म खण्डके ११० वें अध्यायमें इस शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखी है :— 'मुकुमन्ययमान्तंच निर्वाणमोक्षवाचकम् । तद्ददाति च यो देवो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥ मुकुं भक्तिरसप्रेम वचनं वेद सम्मतम् । यस्तद्ददाति विप्रेभ्यो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥'
३४२ विनय-पत्रिका ४—'षट् बरग'—परलोक-विरोधी भीतर स्थित शत्रुओंको कहते हैं । इन्हें अरिवर्ग भी कहते हैं। इनके नाम ये हैं—१ काम (प्राप्त वस्तुके भोगकी इच्छा), २ क्रोध (द्वेष), ३ लोभ (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिकी इच्छा), ४ मोह (आत्मा अनात्मा अथवा शुभ-अशुभ कार्यका अविवेक), ५ मद (गर्व, अहङ्कार), ६ मत्सर (दूसरेकी वृद्धि देखकर जलना ।) ५—'सप्त धातु'—यह शरीर सात धातुओंसे बना हुआ है:—त्वचा (चमड़ा), रक्त, मांस, मेद (चर्बी), मज्जा (अस्थिगत चिकना पदार्थ), अस्थि (हड्डी) और रेत (शुक्र या वीर्य) । ६—'आठ प्रकृति'—१ पृथिवी, २ जल, ३ अग्नि, ४ वायु, ५ आकाश, ६ मन (यहाँ मन शब्दसे समष्टि मन रूप अहङ्कार है), ७ बुद्धि (यहाँ समष्टि बुद्धि रूप महत्तत्त्वका ग्रहण है) और ८ अहङ्कार (यहाँ महत्तत्त्वसे पूर्व शुद्ध अहङ्कारके कारण अज्ञानरूप मूल प्रकृतिसे अभिप्राय है) । ७—'निरबिकार'—पीछे छ विकारोंका उल्लेख किया जा चुका है । ८—'नवद्वारपुर'—यह शरीर नौ द्वारका पुर है । वे नौ द्वार ये हैं--दो आँखें, दो कान, दो नासिका, मुँह, मूत्रेन्द्रिय और गुदा । इसी प्रकार पुरी भी आठ मानी गयी है—१ ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण), २ कर्मेन्द्रिय-पञ्चक (वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद), ३ अन्तः- करणचतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), ४ प्राणादि-पञ्चक (प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान), ५ भूत-पञ्चक (पृथिवी, अप, तेज, वायु और आकाश), ६ काम, ७ त्रिविध कर्म और ८ वासना । ९—'चौदह भुवन'—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ये सात लोक ऊपरके हैं और अतल, वितल; सुतल, तलातल, रसातल, महातल और पाताल ये सात नीचेके हैं। १०—'भेद'—अर्थात् भेद-बुद्धि। वेदान्तशास्त्रने पाँच भेद माना है— १ जीव ईश्वरका भेद, २ जीवोंका परस्पर भेद, ३ जीव-जड़का भेद, ४ जड़- ईश्वरका भेद, ५ जड़-जड़का भेद। आत्मा इन पाँचों भेदोंसे रहित है। अथवा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे आत्मा रहित है। अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं, जैसे
विनय-पत्रिका ३४३ ब्राह्मणका अन्य ब्राह्मणसे । अन्य जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, जैसे ब्राह्मणका शूद्रसे—उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं। अपने अवयवों-(अंगों) से जो सम्बन्ध है, जैसे (हाथ, पैर, मस्तक आदिका सम्बन्ध) उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं । गुसाईंजीने इन्हीं भेदोंको त्यागनेके लिए कहा है । राग कान्हरा २०४ ] जो मन लागै रामचरन अस । देह-गेह-सुत-वित-कलत्र महँ मगन होत बिनु जतन किये जस ॥१॥ द्वन्द्व-रहित, गतमान, ग्यानरत, बिषय-विरत खटाइ नाना कस । सुख-निधान सुजान कोसलपति है प्रसन्न, कहु क्यों न होहिं बस ॥२॥ सर्व-भूत-हित, निर्व्यलीक चित, भगति-प्रेम दृढ़ नेम एक-रस । तुलसिदास यह होइ तबहिं जब द्रवैं ईस, जेहि हतो सीसदस ॥३॥ शब्दार्थ—वित = धन । कलत्र = स्त्री । कस = धातु (काँसा, पीतल, ताँबा आदि), कसौटी । निर्व्यलीक = निर्मल, निर्विकार । भावार्थ—यदि यह मन रामजीके चरणोंमें इस भाँति लग जाय, जैसे वह शरीर, घर, पुत्र, धन, स्त्रीमें बिना किसी प्रकारका यत्न किये ही मग्न हो जाता है ॥१॥ तो वह अनेक कसोंसे खटाकर या अनेक प्रकारके यत्नोंते निर्मल होकर, या (देहादिकी ओरसे) मुड़कर, द्वन्द्व (शीत-उष्ण, सुख-दुःखादि) रहित, मान- रहित, ज्ञानरत, विषयोंसे विरत (निवृत्त) हो जाय । ऐसी दशामें भला कहो तो सही कि आनन्द-घन, ज्ञाननिधान कोशलनाथ रामजी प्रसन्न होकर क्यों नहीं वशमें हो जायँगे ? ॥२॥ सब प्राणियोंकी भलाईका भाव, निर्विकार चित्त, भक्ति- प्रेम, दृढ़ नेम और एक-रस, यह सब तभी होता है, जब रावण-हन्ता भगवान् रामजी कृपा करते हैं ॥३॥ विशेष १—'ग्यानरत'—ज्ञान क्या है, इसपर और अधिक न लिखकर गीताका एक श्लोक लिख देना अधिक उत्तम होगा । भगवान्ने अर्जुनसे कहा है:—
३४४ विनय-पत्रिका सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धिसात्त्विकम् ॥ गीता० अ० १८, श्लोक २० अर्थात् 'जिस ज्ञानसे यह मालूम होता है कि विभक्त अर्थात् भिन्न-भिन्न सब प्राणियोंमें एक ही अविभक्त और अव्यय भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान जानो ।'—आगेके २०५ वें पदमें गोस्वामीजीने भी यही बात कही है। २—'द्वन्द्व-रहित......एकरस'—गोस्वामीजीने इस पदकी दूसरी पंक्तिमें जो देहादि पाँच वस्तुएँ गिनायी हैं, उनकी संगति उन्होंने तीसरी पंक्तिमें द्वन्द्व- रहित आदि पाँच वस्तुओंसे मिलायी है। उसी क्रमसे पाँचवीं पंक्तिमें भी सर्व- भूतहित आदि कहे गये हैं। अर्थात् द्वन्द्व-रहित होते ही सर्वभूत हितता आ जाती है, गतमान होते ही चित्त निर्विकार हो जाता है, ज्ञान-रत (यहाँ साधारण ज्ञानसे आशय है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान तो भक्तिकी चरमावस्था है और यों तो 'ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा' होते ही भक्ति-प्रेमका उद्रेक दिखाई पड़ता है, विषयविरत होते ही दृढ़ नेम हो जाता है और नाना कसोंमें खटाते ही एकरसता प्राप्त हो जाती है। ३—'खटाइ नाना कस'—इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है:— (१) मन इस प्रकार विषयोंसे अलग हो जाता है, जैसे वह कस (काँसा-ताँबा-पीतल आदि) के पात्रोंमें रखी हुई खटाईसे हट जाता है। (२) अनेक प्रकारसे कसनेपर खरा उतरे। (३) अनेकों परीक्षाओंमें पूर्ण उतरे। [२०५] जौ मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु । तौ तजि बिषय-बिकार, सार भजु, अजहूँ जो मैं कहौं सोइ करु ॥१॥ सम, संतोष, बिचार बिमल अति, सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरु । काम-क्रोध अरु लोभ मोह-मद, राग-द्वेष निसेष करि परिहरु ॥२॥
विनय-पत्रिका ३४५ स्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, सिर प्रनाम, सेवा कर अनुसरु । नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि अग-जग-रूप भूप सीतावरु ॥३॥ इहै भगति, बैराग्य, ज्ञान यह, हरि-तोषन यह सुख व्रत आचरु । तुलसिदास सिव-मत मारग यहि चलत सदा सपनेहुँ नाहिंन डरु॥४॥ शब्दार्थ—निसेष = निःशेष, तनिक भी शेष न रहे । अनुसरु = अनुसरण करु । अग = गमनरहित, जड़ । तोषन = प्रसन्न करनेवाला । आचरु = आचरण कर । भावार्थ—रे मन ! जो तू हरिरूपी कल्पवृक्षको भजना चाहता है, तो अभी विषयोंके विकारको छोड़कर साररूप श्रीरामजीको भज और जो मैं कहता हूँ , वही कर ॥१॥ समता, सन्तोष, अत्यन्त निर्मल विचार और सत्संग, इन चारों- को दृढ़ताके साथ धारण कर; काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं राग-द्वेषको बिलकुल ही छोड़ दे ॥२॥ कानोंसे भगवत्कथा सुन, मुखसे रामका नाम ले, हृदयमें भगवान् (के स्वरूप) का ध्यान कर, मस्तकसे उन्हें प्रणाम कर तथा हाथोंसे सेवाका अनुसरण कर । नेत्रोंसे जड़-चैतन्यमय जानकीवल्लभ भगवान् रामचन्द्रको देख ॥३॥ यही भक्ति है, यही वैराग्य है, यही ज्ञान है और यही परमात्माको प्रसन्न करनेवाला शुभ व्रत है । इसीका तू आचरण कर । तुलसीदास कहते हैं कि भगवान् शिवजीका मत है कि इस मार्गपर चलनेसे स्वप्नमें भी डर नहीं रहता ॥४॥ विशेष १—‘नयननि···सीताबरु’—यहाँ गुसाईंजीने नेत्रोंसे भगवान्को देखनेके लिए कहकर परमात्माका रूप भी स्पष्ट रीतिसे बता दिया है कि ‘अग-जग- रूप भूप सीताबरु’। खूब ! २—‘ज्ञान यह’—गुसाईंजी ऊपर बहुत-सी बातें बतलाते हुए कहते हैं कि ‘अग-जग-रूप भूप सीताबरु’ यह समझना ही ज्ञान है । २०४ थे पदकी टीकामें गीताके जिस श्लोकका अवतरण दिया गया है, उससे यहाँ सादृश्य हो जाता है । [२०६] नाहिन और कोउ सरन लायक, दूजो श्रीरघुपति-सम बिपति-निवारन ।