भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 339

३२८ विनय-पत्रिका परमारथ सुरपुर-साधन सब स्वारथ सुखद भलाई। कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई ॥२॥ जहँ जहँ चित चितवत हित, तहँ नित नव विषाद् अधिकाई। रुचि-भावती भभरि भागहिं, समुहाहिं अमित अनभाई ॥३॥ आधि-मगन मन, व्याधि-विकल तन, वचन मलीन झुठाई। एतेहुँ पर तुमसों तुलसी की प्रभु सकल सनेह सगाई ॥४॥ शब्दार्थ-सुरपुर = देवलोक, स्वर्ग । विषाद् = दुःख । भभरि = डरकर । अनभाई = बुरी । भावार्थ—हे राम गुसाइँ ! मैं आपपर बलि जाता हूँ, आप अपने स्वभावके अनुकूल मुझपर कृपा कीजिये ॥१॥ परमार्थके, स्वर्गके साधनोंको एवं सुख देने- वाले और भलाई करनेवाले इहलौकिक स्वार्थोंको तथा सुन्दर चालोंको इस कलियुगने क्रोधके साथ अपनी कठिन कुचालें चलाकर लोप कर दिया है ॥२॥ यह मन जहाँ-जहाँ अपना हित देखता है, वहाँ-वहाँ नित्य नये दुःखोंकी अधिकता है । रुचिको अच्छी लगनेवाली बात डरकर भाग जाती है, और रुचिके प्रतिकूल अगणित वस्तुएँ सामने आती हैं ॥३॥ मन चिन्ता-मग्न हो रहा है, शरीर रोगसे विकल है और वाणी झुठाईके कारण मलिन हो रही है । हे प्रभो ! इतनेपर भी इस तुलसीदासका सब सम्बन्ध और स्नेह आपहीके साथ है ॥४॥ ( १९६ ) काहे को फिरत मन, करत बहु जतन, मिटै न दुख विमुख रघुकुल-वीर । कीजै जो कोटि उपाइ, त्रिबिध ताप न जाइ, कह्यो जो भुज उठाय मुनिवर कीर ॥१॥ सहज टेव विसारि तुही धौं देखु बिचारि, मिलै न मथत वारि घृत बिनु छीर । समुझि तजहि भ्रम, भजहि पद-जुगम, सेवत सुगम, गुन गहन गंभीर ॥२॥