विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३२९ आगम निगम ग्रंथ, रिषि-मुनि, सुर-संत, सबही को एक मत सुनु, मतिधीर । तुलसिदास प्रभु बिनु पियास मरै पसु, जद्यपि है निकट सुरसरि - तीर ॥३॥ शब्दार्थ—कीर = शुकदेवजी । टेव = आदत । छीर = दूध । आगम = शास्त्र । निगम = वेद । सुरसरि = गंगाजी । भावार्थ—रे मन, तू बहुतसे उपाय क्यों करता फिरता है ? तू रघुवंश-वीर श्रीरामजीसे विमुख है, अतः तेरे दुःख दूर नहीं हो सकते । महामुनि शुकदेवजीने हाथ उठाकर (श्रीमद्भागवतमें) यह बात कही है कि करोड़ों उपाय क्यों न करो, (ईश्वर-विमुख रहनेपर) दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों प्रकारके ताप नहीं जा सकते ॥१॥ अपने सहज स्वभावको भूलकर तू ही विचारकर देख न, कहीं बिना दूधके केवल पानी मथनेसे घी मिलता है ? यही समझकर तू भ्रमको छोड़ दे और उन युगल चरणोंको भज, जो सेवा करनेमें सुगम हैं और गुण-गाम्भीर्यमें गहन हैं ॥२॥ रे मन ! सुन, वेद-शास्त्र आदि ग्रन्थोंका, तथा ऋषि-मुनियों, देवताओं, सन्तों एवं और भी जितने शान्त बुद्धिवाले हैं, उन सबका यह एक ही मत है । रे पशु तुलसीदास ! यद्यपि (राम-नामरूपी) गंगाजीका तट निकट है, फिर भी तू प्रभुके बिना प्यासा मर रहा है ॥३॥ विशेष १—'गुन गहन गँभीर'—गोस्वामीजीने अन्यत्र भी यही बात लिखी है— उमा राम-गुन गूढ़, पंडित मुनि पावहिं विरति । पावहिं मोह बिमूढ़, जे हरिविमुख न धर्म-रति ॥ —रामचरितमानस [ १९७ ] नाहिंन चरन-रति, ताहि तें सहौं विपति, कहत श्रुति सकल मुनि मतिधीर । बसै जो ससि-उछंग सुधा-स्वादित कुरंग, ताहि क्यों भ्रम निरखि रबिकर-नीर ॥१॥