भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 330

विनय-पत्रिका ३१९ शरीर नाशवान् है, इसलिए सरल (सड़ा हुआ) कहा है। शरीरकी रचना पंचीकृत पंचमहाभूत-पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश-से हुई है; अतः पंचभूत ही इस शरीररूपी डोलीके साज हैं। अविद्या ही बाँस हैं। प्रारब्ध ही इस खटोलेका बनानेवाला बढ़ई है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ही विषम कहार हैं और कामनारूपी शराब है। शराबीके पैर लड़खड़ाते हैं, यहाँ इन्द्रियरूपी मतवाले कहारोंके पैर भी ठिकानेसे नहीं पड़ रहे हैं। इस डोलीमें जीव बैठा है और उसे ईश्वररूपी नगरमें जाना है। मनका संकल्प-विकल्प ही ऊँची-नीची जमीन है, और पाँचों विषय ही दरारें और दलदल हैं। मनोरथ ही झकझोरा है। कर्म-मार्ग बड़ा दुर्गम है। उसमें स्थल- स्थलपर बझाव है—उलझन है। यह शरीररूपी डोली ज्यों-ज्यों कर्म-मार्गपर जाती है, त्यों-त्यों हम अपने लक्ष्यस्थानसे दूर हटते जाते हैं। अगम मार्ग है, डोली सड़ी-गली है, कहार उन्मत्त हैं, सत्कर्मरूपी कलेवा भी संगमें नहीं है, जहाँ जाना है, वहाँका नाम भी भूल गया है, साधु-महात्माओंसे भेंट भी नहीं होती कि मार्ग पूछा जाय; ऐसी दशामें हम कब गिर जायँगे, पता नहीं। डोली टूटेगी, तब भी गिर जायँगे, कहार चूकेंगे या फँस जायँगे, तब भी हम गिर जायँगे, कलेवा नहीं है, अतः लक्ष्यस्थानपर पहुँचनेमें देर लगेगी या बुढ़ापा आ जायगा तब भी हमारा सर्वनाश हो जायगा। ऐसी दशामें भाई रे ! राम कहता चल, राम कहता चल। क्योंकि नामके प्रतापसे यदि डोली टूट भी जायगी तो 'भवबेगारि' (यानी चौरासी लक्ष योनियों)में न फँसना पड़ेगा। १—'करमचँद'—व्यंगोक्ति है बुरे प्रारब्धके लिए। २—'लोटन'—शब्दका अर्थ कुछ टीकाकारोंने सर्प भी लिखा है। ३—इस यात्रापर महात्मा कबीरकी बानी भी देखिये:— दूर गवन तेरो हंसा हो वर अगम अपार ॥ नहिं काया नहिं माया हो ना त्रिगुन पसार । चारि बरन उहाँ नाहीं हो ना कुल बेवहार ॥ नौ सौ चौदह विद्या हो ना वेद बिचार । जप तप संयम तीरथ हो ना नेम अचार ॥