भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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२४ विनय-पत्रिका वर्म-चर्म कर कृपान, सूल-सेल-धनुष वान, धरनि, दलनि, दानव-दल, रन-करालिका ! पूतना-पिसाच-प्रेत-डाकिनि-साकिनि समेत, भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥२॥ जय महेस-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी, समस्त-लोक स्वामिनी, हिमसेल-बालिका । रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम, देहु है प्रसन्न पाहि प्रनत-पालिका ॥३॥ शब्दार्थ—भुक्ति = भोगैश्वर्य । पर्वसर्वरीस = (पर्व+ शर्वरी+ईश) पूर्णिमाकी रात्रिके स्वामी, चन्द्रमा । तरुन = मध्याह्नकाल । तरनि = सूर्य । मालिका = माला । सेल = साँगी । मृगालि = मृगसमूह । भामिनी = पत्नी । भावार्थ—हे जगज्जननी ! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो । देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं । हे कालिके ! तुम भोग- सामग्री और मोक्ष दोनों देनेवाली हो । कल्याण, आनन्द और अष्टसिद्धियोंकी तुम स्थान हो । तुम हो तो पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान मुखवाली, पर त्रिताप- रूपी अन्धकारका नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्यकी किरण-माला हो ॥१॥ तुम्हारे शरीरपर कवच है और हाथोंमें ढाल, तलवार, त्रिशूल, साँगी और धनुष-बाण है । तुम युद्धमें विकराल रूप धारण करके पृथ्वीके दानव-दलका संहार करनेवाली हो । पूतना, पिशाच, प्रेत, डाकिनी, शाकिनीके सहित भूत, ग्रह और बेतालरूपी पक्षी एवं मृग-समूहको पकड़नेके लिए तुम जालरूप हो ॥२॥ हे शिवे ! तुम्हारी जय हो । तुम्हारे नाम और रूप अनन्त हैं । तुम विश्व-ब्रह्मांड- की स्वामिनी और हिमाचलकी कन्या हो । हे भक्तोंका पालन करनेवाली ! तुलसीदास तुम्हारी शरणमें है । उसे तुम प्रसन्न होकर श्री रघुनाथजीके चरणोंमें परम प्रेम और अचल नेम दो ।