भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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विनय-पत्रिका २७ गंगा-स्तुति राग रामकली ( १७ ) जय जय भगीरथ-नन्दिनि, मुनि-चय-चकोर-चन्दिनि, नर-नाग-बिबुध-वन्दिनि, जय जह्नु-बालिका। बिस्नु-पद-सरोज जासि, ईस-सीस पर विभासि, त्रिपथगासि, पुन्य-रासि, पाप-छालिका ॥१॥ विमल-विपुल-वहसि वारि, सीतल त्रयताप-हारि, भँवर वर विभंगतर तरंग-मालिका। सुर जन पूजोपहार, सोभित ससि धवल धार, भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका ॥२॥ निज तटवासी विहंग, जल-थल-चर पसु-पतंग, कीट, जटिल तापस सब सरिस पालिका। तुलसी सब तीर तीर सुमिरत रघुबंस-वीर, विचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ॥३॥ शब्दार्थ—नन्दिनि = पुत्री। चय = समूह। त्रिपथगासि = पृथिवी, पाताल और स्वर्ग- लोकके मार्गोंसे जानेवाली हो। छालिका = धोनेवाली। विभंगतर = अत्यन्त चञ्चल। थालिका = थाल्हा, खन्तोला। भावार्थ—हे भगीरथ-नन्दिनी गंगे ! तुम्हारी जय हो, जय हो। तुम मुनि- समूहरूपी चकोरोंके लिए चन्द्रिकारूप हो। मनुष्य, नाग और देवता तुम्हारी वन्दना करते हैं। हे जाह्नवी ! तुम्हारी जय हो। तुम विष्णु भगवान्‌के चरण- कमलोंसे उत्पन्न हुई हो; शिवजीके मस्तकपर शोभा पा रही हो; तुम आकाश, पाताल और मर्त्यलोक तीनों मागोंमें तीन धाराओंसे बहती हो। तुम पुण्य-राशि हो और पापोंको धो डालनेवाली हो ॥१॥ तुम शीतल और दैहिक-दैविक-भौतिक तीनों तापोंको हरनेवाला अथाह निर्मल जल धारण किये हो। तुम सुन्दर भँवर

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