विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ विनय-पत्रिका तथा अत्यन्त चंचल तरंगोंकी माला धारण किये रहती हो। पुरवासियोंने तुम्हें पूजामें जो सामग्री भेंट की है, उससे चन्द्रमाके समान तुम्हारी उज्ज्वल धारा सुशोभित है। वह धारा संसारके भारको नाश करनेवाली तथा भक्तिरूपी कल्प- वृक्षके लिए थाल्हा है ॥२॥ तुम अपने किनारेपर रहनेवाले पक्षी, जलचर, थलचर, पशु, पतंग, कीड़े-मकोड़े तथा जटाधारी तपस्वी सबका समान रूपसे पालन करती हो। हे मोहरूपी महिषासुरका वध करनेके लिए कालिकारूप गंगे ! मुझ तुलसीदासको ऐसी बुद्धि दो कि जिससे मैं श्रीरामजीका स्मरण करता हुआ तुम्हारे किनारे-किनारे विचरण कर सकूँ ॥३॥ विशेष १—‘भगीरथ-नन्दिनि’—सूर्यवंशमें सगर नामके महापराक्रमी राजा थे। उनकी दो रानियाँ थीं। एकसे अंशुमान् पैदा हुए और दूसरीसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। राजा सगरके प्रतापसे देवराज इन्द्र सदैव संत्रस्त रहा करता था। उसने ईर्ष्यावश राजा सगरके अश्वमेध यज्ञका घोड़ा चुरा लिया और उसे ले जाकर योगेश्वर कपिलमुनिके आश्रमपर बाँध दिया। उस घोड़ेको ढूँढ़नेके लिए सगरके साठ हजार पुत्र निकले। मुनिके आश्रमपर घोड़ेको बँधा देखकर उन्हें कटु वाक्य कहा। इससे कपिलदेवजीने क्रुद्ध होकर उन्हें भस्म कर दिया। महाराज अंशुमान्के पुत्र भगीरथ हुए। उन्होंने घोर तपस्या की और श्रीगंगाजीको पृथ्वीपर लाकर उन लोगोंका उद्धार किया। इसीसे श्रीगंगाजीको ‘भगीरथ नन्दिनी’ या ‘भागीरथी’ कहा जाता है। २—‘जह्नु बालिका’—राजा भगीरथ अपने रथके पीछे-पीछे गङ्गाजीको भूलोकमें ला रहे थे। मार्गमें जह्नु मुनिका आश्रम मिला। मुनिने कुपित होकर उस प्रवाहको पान कर डाला। जब राजा भगीरथने स्तुति द्वारा उन्हें प्रसन्न किया, तब मुनिने संसारके कल्याणार्थ गङ्गाजीको अपनी जङ्घासे निकाल दिया। इसीसे गङ्गाजीका नाम ‘जह्नुसुता’ या ‘जाह्नवी’ पड़ा। लिखा है:— जानु द्वारा पुरा दत्ता जह्नु सम्पीय कोपतः। तस्य कन्यास्वरूपा च जाह्नवी तेन कीर्त्तिता ॥ —ब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डम्।