विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ विनय-पत्रिका जन्मका भूखा भिखारी हूँ। इस (जन्मके भूखे) तुलसीदासको भक्तिरूपी अमृतके समान सुन्दर भोजन पेटभर खिला दीजिये ॥५॥ विशेष १—'रटत······काजु'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि—यह गिड़गिड़ानेवाला रट रहा है, इसे कौर या भोजनसे ही काम है; और किसी बातके लिए आरि (हठ) नहीं है। २—'बानइत सिरताजु'—का अर्थ 'बाना रखनेवालोंमें श्रेष्ठ' भी हो सकता है। [ २२० ] करिय सँभार, कोसलराय ! और ठौर न और गति, अवलंब नाम विहाय ॥१॥ बूझि अपनी आपनो हित आप बाप न माय । राम ! राउर नाम गुरु, सुर, स्वामि, सखा, सहाय ॥२॥ रामराज न चले मानस-मलिन के छल-छाय । कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घालत घाय ॥३॥ लेत केहरि को बयर ज्यों भेक हनि गोमाय । त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय ॥४॥ अकनि याके कपट-करतब, अमित अनय-अपाय । सुखी हरिपुर बसत होत परीच्छितहिं पछिताय ॥५॥ कृपासिंधु ! विलोकिये, जन-मनकी साँसति साय । सरन आयो, देव ! दीनदयालु ! देखन पाय ॥६॥ निकट बोलि न बरजिये, बलि जाउँ, हनिय न हाय । देखिहैं हनुमान गोमुख नाहरनि के न्याय ॥७॥ अरुन मुख, भ्रू विकट, पिंगल नयन रोष-कषाय । बोर सुमिरि समीर को घटिहै चपल चित चाय ॥८॥ बिनय सुनि बिहँसे अनुज सों बचन के कहि भाय । 'भली कही' कह्यो लषन हूँ हँसि, बने सकल बनाय ॥९॥