भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 475 में से

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पृष्ठ 380

विनय-पत्रिका ३६९ दई दीनहिं दादि, सो सुनि सुजन-सदन बधाय । मिटे संकट सोच, पोच-प्रपंच, पाप-निकाय ॥१०॥ पेखि प्रीति-प्रतीति जनपर अगुन अनघ अमाय । दास तुलसी कहत मुनिगन, जयति जय उरुगाय ॥११॥ शब्दार्थ—विहाय = छोड़कर । वयर = वैर । भेक = मेढ़क । गोमाय = सियार । निकाम = व्यर्थ, निष्प्रयोजन । कुदाय = कुघात । अकनि = सुनकर, जानकर । साय = शान्त हो । नाहरनि = शेरों । पिंगल = पीला । कपाय = लाल । दादि = इन्साफ । पेखि = देखकर । अनघ = निष्पाप, पवित्र । अमाय = मायारहित । उरुगाय = विष्णु भगवान्‌का एक नाम । भावार्थ—हे कोशलेन्द्र ! मेरा सम्भार कीजिये । आपके नामको छोड़कर न तो मुझे और कोई ठौर है, और न दूसरी कोई गति ही है ॥१॥ अपनी (करनी) और अपना हित समझकर मैंने आपकीही शरण ली है, (क्योंकि ऐसी जघन्य करनीवालेका हित या उद्धार करनेवाला) दूसरा कोई माँ-बाप नहीं है । इसलिए हे रामजी ! मेरे लिए आपका नाम ही गुरु, देवता, स्वामी, मित्र और बल है ॥२॥ हे रामजी ! आपके राज्यमें कलियुगके मलिन मानसके छलकी छाया नहीं पड़ती; किन्तु यह कायर कलिकाल उसी क्रोधके कारण मुझ मरे हुएको भी घावोंसे घायल कर रहा है ॥३॥ जैसे गीदड़ किसी मेढकको मारकर सिंहका वैर लेता है, उसी प्रकार यह (कलि) मुझे आपका दास जानकर व्यर्थ ही बुरी तरह मार रहा है ॥४॥ यद्यपि राजा परीक्षित सुखसे वैकुण्ठमें निवास कर रहे हैं, पर इसके कपटपूर्ण कर्तव्यों, अगणित अनीतियों और विघ्न-बाधाओंको सुनकर वह भी पछता रहे हैं ॥५॥ हे कृपासिन्धु ! जरा इस दासके मनके क्लेशोंको देखिये । हे दीनदयालु देव ! (यह सेवक) आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिए शरणमें आया है ॥६॥ हाय मैं आपकी बलैया लेता हूँ, आप उसे निकट बुलाकर मना न करें, उसे मारें भी न, (इसकी जरूरत नहीं है; केवल) हनुमान्‌जीको ही सहेज दीजिये, वह इसकी ओर वैसे ही देखेंगे, जैसे गायके मुखकी ओर शेर देखता है ॥७॥ पवनकुमारके लाल मुख, विकट भौंहों, क्रोधके कारण लाल हुए पीले नेत्रोंका स्मरण करते ही चंचल चित्तवाले कलिका चाव कम हो जायगा ॥८॥ मेरी विनय सुनकर श्रीरामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मणसे इन बातोंका असली भाव कहकर हँस पड़े । लक्ष्मणजीने भी हँसकर कहा कि खूब कहा है । २४

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