विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० विनय-पत्रिका बस, अब मेरी सब बात बन गयी ॥९॥ इस दीनको भगवान् रामचन्द्रजीने दाद दी है, यह सुनकर सन्तोंके घरमें बधाई बजने लगी । संकट, शोक, क्षुद्र प्रपंच और पाप-समूह ये सब मिट गये ॥१०॥ निर्गुण, पवित्र और माया-रहित रामजी- का इस दासपर प्रेम और विश्वास देखकर हे तुलसीदास ! मुनि कहने लगे कि महान् यशस्वी भगवान्की जय हो, जय हो ॥११॥ विशेष १—'परीछितहिं पछिताय'—एक बार महाराज परीक्षित्ने शिकार खेलनेके लिए वनमें जाकर देखा, एक काला पुरुष हाथमें मूसल लिये एक गाय और लँगड़े बैलको खदेड़ रहा था। पूछनेपर उन्हें मालूम हुआ कि काला पुरुष कलि- युग है, गाय पृथिवी है और बैल धर्म है। महाराजने क्रुद्ध होकर कलियुगको मारनेके लिए तलवार निकाल ली। काला पुरुष भयभीत होकर उनके पैरोंपर गिर पड़ा। महाराजने उसे शरणमें आया जानकर छोड़ दिया और चौदह स्थानोंमें रहनेके लिए आज्ञा दे दी। उनमें एक सुवर्ण भी था। महाराजके सिरपर सोनेका मुकुट था, अतः कलि उनके सिरपर भी सवार हो गया। परिणाम यह हुआ कि राजाने कलिके प्रभावसे एक ध्यानावस्थित ऋषिके गलेमें मरा हुआ सर्प डाल दिया। इसपर मुनिके पुत्रने राजाको शाप दिया कि मेरे पिताके गलेमें सर्प डालनेवाला मनुष्य आजसे सातवें दिन तक्षक सर्पके काटने- से मर जायगा। अस्तु, वही पश्चात्ताप राजाको बना रह गया कि मैंने कलिपर दया क्यों की ? यह कथा श्रीमद्भागवत पुराणमें है। २—'बिनय सुनि'—से लेकर इस पदके अन्ततक कविने अपने मनोराज्यमें विचरण किया है। काव्यकला और पाण्डित्यकी अपूर्व झलक है। ३—'बिहँसे'—गोस्वामीजीने हर जगह अत्यन्त रहस्यपूर्ण बातोंपर ही भगवान्का विहँसना या मुसकराना लिखा है। जैसे सुग्रीवकी उक्तिपर रामजीका हँसना गोस्वामीजीने लिखा है:— 'तब रघुपति बोले मुसुकाई।' [२२१] नाथ ! कृपा ही को पन्थ चितवत दीन हौं दिनराति। होइ धौं केहि काल दीनदयालु ! जानि न जाति ॥१॥