भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 382

विनय-पत्रिका ३७१ सुगुन, ग्यान-विराग-भगति, सु-साधननि की पाँति। भजे विकल बिलोकि कलि अघ अवगुननि की थाति ॥२॥ अति अनीति-कुरीति भइ भुइँ तरनि हूँ ते ताति। जाउँ कहाँ ? बलि जाउँ, कहूँ न ठाउँ, मति अकुलाति ॥३॥ आप सहित न आपनो कोड, बाप ! कठिन कुभाँति। स्यामघन ! सींचिये तुलसी, सालि सफल सुखाति ॥४॥ शब्दार्थ—थाति = अमानत, धरोहर। ताति = तप्त। सालि = धान। सफल = फलके सहित, फूटा हुआ। भावार्थ—हे नाथ ! मैं दीन हूँ, दिन-रात आपकी ही कृपाकी बाट देखता रहता हूँ। हे दीनदयालु ! आपकी कृपा किस समय होगी, जाना नहीं जाता ॥१॥ सुन्दर गुण, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और सुन्दर साधनोंके समूह पापों और अवगुणोंकी थाती स्वरूप कलिको देखते ही व्याकुल होकर भाग गये ॥२॥ अत्यन्त अनीति और कुरीतियोंके कारण यह पृथिवी सूर्यसे भी अधिक तप्त हो गयी है। मैं आपकी बलि जाऊँ नाथ ! कहाँ जाऊँ ? कहीं भी ठिकाना नहीं है। बुद्धि घबरा रही है ॥३॥ हे पिताजी ! जो अपना है (जैसे शरीर), वह भी अपने साथ नहीं (अर्थात् वह भी साथ छोड़ देता है)। कठिन (बेढब) बुरी रीति है। हे घनश्याम ! तुलसीरूपी फूटे हुए धानकी खेती सूखी जा रही है, उसे सींचिये ॥४॥ [ २२२ ] बलि जाउँ, और कासों कहौं ? सद्गुनसिंधु स्वामि सेवक-हितु कहूँ न कृपानिधि-सो लहौं ॥१॥ जहँ जहँ लोभ-लोल लालचबस निजहित चित चाहनि चहौं। तहँ तहँ तरनि तकत उलूक ज्यों भटकि कुतरु-कोटर गहौं ॥२॥ काल-सुभाउ-करम बिचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहौं। मोको तौ सकल सदा एकहि रस दुसह दाह दारुन दहौं ॥३॥ उचित अनाथ होइ दुख-भाजन भयो नाथ ! किंकर न हौं। अब रावरो कहाइ न बूझिये, सरनपाल ! साँसति सहौं ॥४॥