भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 383

३७२ विनय-पत्रिका महाराज ! राजीवविलोचन ! मगन पाप-संताप हौं । तुलसी प्रभु ! जब तब जेहि तेहि बिधि राम निबाहे निरबहौं ॥५॥ शब्दार्थ—लोल = चंचल । तरनि = सूर्य । बूझिये = चाहिये । भावार्थ—बलिहारी ! (हे नाथ ! मैं अपना दुःख) और किससे कहूँ ? हे कृपानिधान ! आपके समान सद्गुणोंका समुद्र तथा सेवकोंका हितू स्वामी मुझे कहीं नहीं मिल सकता ॥१॥ जहाँ-जहाँ लोभसे चंचल और लालचवश चित्तमें अपने हितकी कामना करता हूँ, वहाँ वहाँसे मैं इस तरह निराश होकर लौट आता हूँ, जैसे सूर्यको देखते ही उल्लू भटकता हुआ आकर कुत्सित पेड़के कोटरका आश्रय लेता है (अर्थात् जैसे उल्लू भोजनके निमित्त जहाँ-तहाँ भटकता फिरता है, किन्तु सूर्यकी लालिमा दिखाई पड़ते ही उसका अनेक मनोरथ निवृत्त हो जाता है और वह वृक्षके कोटरमें घुस जाता है, उसी प्रकार मैं भी जीविकाके लोभसे ऐश्वर्यवानोंके पास जाता हूँ, पर सूर्यके समान उनके क्रूर स्वभावका परिचय पाते ही कोटरके समान अपने निवासस्थानपर लौट आता हूँ) ॥२॥ काल, स्वभाव और कर्म विचित्र फल देनेवाले हैं, यह सुनकर मैं सिर पटककर रह जाता हूँ; क्योंकि मेरे लिए तो ये तीनों सदैव एक रस हैं, मैं तो सदैव दुःसह और भयंकर ज्वालासे जला करता हूँ ॥३॥ हे नाथ ! अबतक मैं अनाथ था, आपका दास नहीं हुआ था, अतः दुःखोंका पात्र बन रहा था, यह उचित ही था; किन्तु हे शरणागतपालक ! अब मैं आपका कहाकर भी दुःख भोगूँ, ऐसा आपको नहीं चाहिये ॥४॥ हे महाराज ! हे कमलनेत्र ! मैं पाप- सन्तापमें डूबा हुआ हूँ । हे प्रभो ! हे रामजी ! तुलसीका निर्वाह तभी होगा, जब आप येनकेन प्रकारेण निर्वाह करेंगे ॥५॥ [ २२३ ] आपनो कबहुँ करि जानिहौ । राम गरीवनिवाज राज-मनि, बिरद-लाज उर आनिहौ ॥१॥ सील-सिन्धु, सुन्दर, सब लायक, समरथ, सदगुन-खानि हौ। पाल्यो है, पालत, पालहुगे प्रभु, प्रनत-प्रेम पहिचानि हौ ॥२॥