भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 384, कुल 475 में से

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पृष्ठ 384

विनय-पत्रिका ३७३ बेद-पुरान कहत, जग जानत, दीनदयालु दिन-दानि हौ। कहि आवत, बलि जाउँ, मनहुँ मेरी बार बिसारे बानि हौ ॥३॥ आरत-दीन अनाथनि के हित मानत लौकिक कानि हौ। है परिनाम भलो तुलसी को सरनागत-भय भानिहौ ॥४॥ शब्दार्थ— बानि = आदत, स्वभाव। कानि = लज्जा, प्रतिष्ठा। भानिहौ = नष्ट करोगे। भावार्थ— हे नाथ ! क्या कभी आप मुझे अपना समझेंगे ? हे गरीबोंको निहाल करनेवाले राज-राजेश्वर श्रीरामजी ! क्या कभी आप अपने बानेकी लाज रखनेपर ध्यान देंगे ? ॥१॥ आप शीलके समुद्र, सुन्दर, सब-कुछ करने योग्य, समर्थ और सद्गुणोंकी खानि हैं। हे प्रभो ! आपने ही पालन किया है, पालन कर रहे हैं और पालन करेंगे; अतः क्या कभी आप इस शरणागतका प्रेम पह- चानेंगे ? वेद और पुराण कहते हैं, तथा संसार जानता है कि आप दीनोंपर दया करनेवाले और प्रतिदिन उन्हें कल्याणदान देनेवाले हैं। किन्तु (मुझे विवश होकर) कहना पड़ता है, बलैया लेता हूँ, आपने मानो मेरी बार अपनी आदतको भुला दिया है ॥३॥ अब आप आर्त, दीन और अनाथोंका हित करनेमें लौकिक लज्जा मान रहे हैं ! अर्थात् यह सोच रहे हैं कि तुलसी-सरीखे घोर पातकीका उद्धार करनेमें बड़ी बदनामी होगी ? कुछ भी हो, तुलसीदास- का तो परिणाम अच्छा ही है, क्योंकि अन्तमें तो आप इस शरणागतका संसार- भय नष्ट करेंगे ही ॥४॥ [ २२४ ] रघुबरहिं कबहुँ मन लागिहै ? कुपथ, कुचाल, कुमति, कुमनोरथ, कुटिल कपट कब त्यागिहै ॥१॥ जानत गरल अमिय विमोहबस, अमिय गनत करि आगिहै। उलटी रीति-प्रीति अपनेकी तजि प्रभुपद अनुरागिहै ॥२॥ आखर अरथ मंजु मृदु मोदक राम-प्रेम-पाग पागिहै। ऐसे गुन गाइ रिझाइ स्वामिसों पाइहै जो मुँह मागिहै ॥३॥ तू यहि विधि सुख-सयन सोइहै, जियकी जरनि भूरि भागिहै। राम-प्रसाद दासतुलसी उर राम-भगति-जो जागिहै ॥४॥

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