विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७४ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—गरल = विष। अमिय = अमृत। भूरि = बहुत। भावार्थ—क्या कभी मेरा मन श्रीरामजीमें लगेगा? वह कुमार्ग, कुचाल, कुबुद्धि, बुरी कामना और कुटिल कपट कब छोड़ेगा? ॥१॥ अज्ञानके कारण (मेरा मन) विष-(विषय-वासनाओं) को तो अमृत समझ रहा है और अमृत- (ईश्वर-भजन) को आग जान रहा है। क्या वह अपनी इस उलटी रीति और अपनोंकी (झूठी) प्रीति छोड़कर भगवान्के चरणोंमें अनुराग करेगा? ॥२॥ क्या वह (राम नामके) सुन्दर और कोमल अर्थरूपी मोदकको रामजीके प्रेम- रूपी चाशनीमें पागेगा? (अर्थात् क्या वह कभी प्रेमपूर्ण हृदयमें अर्थ-सहित राम-नामका जप करेगा?) इस प्रकार अपने स्वामीके गुण गा-गाकर रिझा लेनेपर रे मन! तू अपने मुँहसे जो कुछ भी माँगेगा, वही उनसे पा जायगा ॥३॥ ऐसा करनेसे तू सुखकी नींद सोयेगा (सद्गतिको प्राप्त हो जायगा), और तेरे हृदयकी गहरी जलन दूर हो जायेगी। हे तुलसीदास! श्रीरामजीके प्रसादसे तेरे हृदयमें रामजीका प्रेमरूप योग जागृत हो जायगा ॥४॥ विशेष १—'कुपथ'....'त्यागिहै'—यथार्थतः मानव-देहकी सार्थकता इन सबके छोड़नेमें ही है। दुर्लभ मनुष्य-शरीर व्यर्थ खोनेके लिए नहीं है। देखिये:— दुर्लभ या नर देह अमोलक पाइ अजान अकारथ खोवै। सो मति हीन बिबेक बिना नर साज मतंगहिं ईंधन ढोवै॥ कंचन-भाजन धूरि भरै सठ मूढ़ सुधारस सौं पग धोवै। बोहित काग उड़ावन कारन डारि महा मनि मूरख रोवै॥ —अलंकार-आशय। [ २२५ ] भरोसो और आइहै उर ताके। कै कहुँ लहै जो रामहि-सो साहिब, कै अपनो बल जाके ॥१॥ कै कलिकाल कराल न सूझत, मोह-मार-मद छाके। कै सुनि स्वामि-सुभाउ न रह्यो चित, जो हित सब अँग थाके ॥२॥