विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३७५ हौं जानत भलिभाँति अपनपौ, प्रभु-सो सुन्यो न साके । उपल, भील, खग, मृग, रजनीचर, भले भये करतब काके ॥३॥ मोको भलो राम-नाम सुरतरु-सो, रामप्रसाद कृपालु कृपा के । तुलसी सुखी निसोच राज ज्यों बालक माय-बवाके ॥४॥ शब्दार्थ—छाके = छका हुआ । सब अंग = सब तरहसे । साके = कीर्ति । उपल = पत्थर । बबा = बाप । भावार्थ—उसी मनुष्यके हृदयमें और किसीका भरोसा होगा, जिसे या तो कहीं राम-सरीखा स्वामी मिल गया हो, अथवा जिसे अपना बल हो ॥१॥ अथवा मोह, काम और मदसे छका रहनेके कारण जिसे कराल कलिकाल न सूझ पड़ता हो या सब प्रकारसे थके हुए (सब साधनोंसे हीन) लोगोंके हितकारी स्वामी श्रीरामजीका स्वभाव सुनकर भी जिसे उसका स्मरण न हो ॥२॥ किन्तु मैं अपना पौरुष भली भाँति जानता हूँ, और मैंने श्रीरामजीके समान और किसीकी कीर्ति भी नहीं सुनी है। पाषाणी (अहिल्या), भील, पक्षी, मृग (मारीच) और राक्षस इनमें किसका कर्म उत्तम हुआ था ? ॥३॥ कृपालु रामजीकी कृपाके प्रसादसे मेरे लिए तो राम-नाम ही कल्पवृक्षके समान अच्छा है । अब यह तुलसी वैसे ही निश्चिन्त और सुखी है जैसे माँ-बापके राज्यमें बालक ॥४॥ विशेष १—'उपल'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । २—'भील'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । ३—'खग'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ४—'मृग'—मारीच; यह रावणका मामा था । रावणके कहनेसे यह माया- मृग बनकर पंचवटीमें गया । इसका मनोहर रूप देखकर सीताजीने इसका चर्म लेनेकी इच्छा प्रकट की । जब भगवान् इसे मारनेको गये और पश्चात् इसकी मृत्युका आर्त्तनाद सुनकर जानकीजीने लक्ष्मणजीको वहाँ भेज दिया, तब अवसर पाकर रावण जानकीजीके पास आया और उन्हें लेकर लङ्कामें चला गया । मारीच स्वयं तो भगवद्भक्त था, किन्तु रावणकी आज्ञासे उसे ऐसा करना पड़ा था ।