भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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३७६ विनय-पत्रिका [ २२६ ] भरोसो जाहि दूसरो सो करो । मोको तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो ॥१॥ करम उपासन, ग्यान, वेदमत, सो सब भाँति खरो । मोहि तो सावन के अंधहि, ज्यों सूझत रंग हरो ॥२॥ चाटत रह्यो स्वान पातरि ज्यों कवहूँ न पेट भरो । सो हौं सुमिरत नाम सुधारस पेखत परसि धरो ॥३॥ स्वारथ औ परमारथ हू को नहिं कुंजरो-नरो । सुनियत सेतु पयोधि पखाननि करि कपि-कटक तरो ॥४॥ प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी, तहँ ताको काज सरो । मेरे तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो ॥५॥ संकरु साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो । अपनो भलो राम-नामहिं तें तुलसिहि समुझि परो ॥६॥ शब्दार्थ—पेखत = देखता हूँ। परसि = स्पर्श करके । कटक = सेना । सरो = पूरा होता है । अरनि = हठ । भावार्थ—जिसे दूसरा कोई भरोसा हो, वह (और कुछ) करे । मेरे लिए तो इस कलिमें राम-नामरूपी कल्पवृक्ष ही कल्याणका फल फला हुआ है ॥१॥ कर्मकांड, उपासनाकांड, ज्ञानकांड ये त्रिकांड वेद सम्मत हैं और सब प्रकारसे खरे हैं; पर मुझे तो सावनके अन्धेकी भाँति हरियाली ही दिखाई पड़ रही है (अर्थात् चारों ओर राम-नाममें ही भलाई दिखाई पड़ रही है) ॥२॥ पहले मैं कुत्तेकी तरह पत्तल चाटता रहा, कभी पेट न भरा; किन्तु अब वही मैं रामनाम- का स्मरण करते ही अमृत-रस परोसकर रखा हुआ देखता हूँ। भाव यह कि पहले मैंने बहुतसे साधन किये, पर कामना न मिटी; किन्तु राम-नामके प्रभावसे मुझे अमृत-रस अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष परोसा हुआ दिखाई पड़ रहा है, और उसे लेनेकी इच्छा नहीं हो रही है ॥३॥ स्वार्थ और परमार्थ दोनोंकी प्राप्तिके लिए मैं 'नरो कुंजरो' कुछ नहीं कह सकता (अर्थात् दोनों ही मेरे सामने परोसे हुए रखे हैं, पर मैं 'नरो-कुंजरो' कुछ नहीं कहता यानी एकको

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