भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 388

भी नहीं चाहता)। सुना है कि नामके ही प्रभावसे बानरी सेना पत्थरोंका पुल बनाकर समुद्र पार कर गयी थी। अर्थात् जिस नामकी इतनी बड़ी महिमा है, उसे छोड़कर मैं स्वार्थ और परमार्थके बखेड़ेमें क्यों पहूँ ? ॥४॥ जहाँ जिसका प्रेम और विश्वास है, वहीं उसका काम पूरा होता है। मेरे माँ-बाप तो राम-नामके दोनों अक्षर ही हैं—इन्हींके आगे मैं बाल-हठसे अड़ा हुआ हूँ ॥५॥ इसमें यदि मैं कुछ छिपाकर कहता होऊँ, तो शिवजी साक्षी हैं मेरी जीभ जल जाय या गल जाय। तुलसीको तो अपना भला राम-नामसे ही समझ पड़ा है ॥६॥

विशेष १—'नहि कुंजरो नरो'—भगवान्ने महाभारत युद्धमें द्रोणाचार्यका बध कराना आवश्यक समझा। अतः भीमसेनने अश्वत्थामा नामके हाथीको मार डाला। द्रोणाचार्यके प्रिय पुत्रका नाम भी अश्वत्थामा था। अश्वत्थामाके मारे जानेका हाल पाकर द्रोणने युधिष्ठिरसे पूछा कि कौन मारा गया है ? उन्होंने सोचा कि युधिष्ठिर झूठ न बोलेंगे। धर्मराजने कहा—'अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा।' अर्थात् अश्वत्थामा मारा गया, मनुष्य या हाथी। उन्होंने 'मनुष्य' तो जोरसे कहा, पर 'हाथी' धीरेसे कहा। प्रिय पुत्रके मरनेका समा- चार सुनकर ज्यों ही द्रोणाचार्य मूर्च्छित-से हुए, त्यों ही धृष्टद्युम्नने उनका मस्तक काट लिया। तभीसे 'नरो-कुंजरो' का प्रयोग बोल-चालमें होने लगा है।

[ २२७ ] नाम, राम रावरोई हित मेरे। स्वारथ परमारथ साथिन्ह सों भुज उठाइ कहौं टेरे ॥१॥ जननी-जनक तज्यो जनमि, करम बिनु बिधिहु सृज्यो अवडेरे। मोहुँसे कोउ कोउ कहत रामहि को, सो प्रसंग केहि केरे ॥२॥ फिऱ्यो ललात बिनु नाम उदर लगि, दुखउ दुखित मोहिं हेरे। नाम-प्रसाद लहत रसाल-फल अब हौं बबुर बहेरे ॥३॥ साधत साधु लोक परलोकहिं, सुनि गुनि जतन घनेरे। तुलसी के अवलम्ब नाम को, एक गाँठि कइ फेरे ॥४॥