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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

३७४ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—गरल = विष। अमिय = अमृत। भूरि = बहुत। भावार्थ—क्या कभी मेरा मन श्रीरामजीमें लगेगा? वह कुमार्ग, कुचाल, कुबुद्धि, बुरी कामना और कुटिल कपट कब छोड़ेगा? ॥१॥ अज्ञानके कारण (मेरा मन) विष-(विषय-वासनाओं) को तो अमृत समझ रहा है और अमृत- (ईश्वर-भजन) को आग जान रहा है। क्या वह अपनी इस उलटी रीति और अपनोंकी (झूठी) प्रीति छोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें अनुराग करेगा? ॥२॥ क्या वह (राम नामके) सुन्दर और कोमल अर्थरूपी मोदकको रामजीके प्रेम- रूपी चाशनीमें पागेगा? (अर्थात् क्या वह कभी प्रेमपूर्ण हृदयमें अर्थ-सहित राम-नामका जप करेगा?) इस प्रकार अपने स्वामीके गुण गा-गाकर रिझा लेनेपर रे मन! तू अपने मुँहसे जो कुछ भी माँगेगा, वही उनसे पा जायगा ॥३॥ ऐसा करनेसे तू सुखकी नींद सोयेगा (सद्गतिको प्राप्त हो जायगा), और तेरे हृदयकी गहरी जलन दूर हो जायेगी। हे तुलसीदास! श्रीरामजीके प्रसादसे तेरे हृदयमें रामजीका प्रेमरूप योग जागृत हो जायगा ॥४॥ विशेष १—'कुपथ'....'त्यागिहै'—यथार्थतः मानव-देहकी सार्थकता इन सबके छोड़नेमें ही है। दुर्लभ मनुष्य-शरीर व्यर्थ खोनेके लिए नहीं है। देखिये:— दुर्लभ या नर देह अमोलक पाइ अजान अकारथ खोवै। सो मति हीन बिबेक बिना नर साज मतंगहिं ईंधन ढोवै॥ कंचन-भाजन धूरि भरै सठ मूढ़ सुधारस सौं पग धोवै। बोहित काग उड़ावन कारन डारि महा मनि मूरख रोवै॥ —अलंकार-आशय। [ २२५ ] भरोसो और आइहै उर ताके। कै कहुँ लहै जो रामहि-सो साहिब, कै अपनो बल जाके ॥१॥ कै कलिकाल कराल न सूझत, मोह-मार-मद छाके। कै सुनि स्वामि-सुभाउ न रह्यो चित, जो हित सब अँग थाके ॥२॥

विनय-पत्रिका ३७५ हौं जानत भलिभाँति अपनपौ, प्रभु-सो सुन्यो न साके । उपल, भील, खग, मृग, रजनीचर, भले भये करतब काके ॥३॥ मोको भलो राम-नाम सुरतरु-सो, रामप्रसाद कृपालु कृपा के । तुलसी सुखी निसोच राज ज्यों बालक माय-बवाके ॥४॥ शब्दार्थ—छाके = छका हुआ । सब अंग = सब तरहसे । साके = कीर्ति । उपल = पत्थर । बबा = बाप । भावार्थ—उसी मनुष्यके हृदयमें और किसीका भरोसा होगा, जिसे या तो कहीं राम-सरीखा स्वामी मिल गया हो, अथवा जिसे अपना बल हो ॥१॥ अथवा मोह, काम और मदसे छका रहनेके कारण जिसे कराल कलिकाल न सूझ पड़ता हो या सब प्रकारसे थके हुए (सब साधनोंसे हीन) लोगोंके हितकारी स्वामी श्रीरामजीका स्वभाव सुनकर भी जिसे उसका स्मरण न हो ॥२॥ किन्तु मैं अपना पौरुष भली भाँति जानता हूँ, और मैंने श्रीरामजीके समान और किसीकी कीर्ति भी नहीं सुनी है। पाषाणी (अहिल्या), भील, पक्षी, मृग (मारीच) और राक्षस इनमें किसका कर्म उत्तम हुआ था ? ॥३॥ कृपालु रामजीकी कृपाके प्रसादसे मेरे लिए तो राम-नाम ही कल्पवृक्षके समान अच्छा है । अब यह तुलसी वैसे ही निश्चिन्त और सुखी है जैसे माँ-बापके राज्यमें बालक ॥४॥ विशेष १—'उपल'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । २—'भील'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । ३—'खग'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ४—'मृग'—मारीच; यह रावणका मामा था । रावणके कहनेसे यह माया- मृग बनकर पंचवटीमें गया । इसका मनोहर रूप देखकर सीताजीने इसका चर्म लेनेकी इच्छा प्रकट की । जब भगवान् इसे मारनेको गये और पश्चात् इसकी मृत्युका आर्त्तनाद सुनकर जानकीजीने लक्ष्मणजीको वहाँ भेज दिया, तब अवसर पाकर रावण जानकीजीके पास आया और उन्हें लेकर लङ्कामें चला गया । मारीच स्वयं तो भगवद्भक्त था, किन्तु रावणकी आज्ञासे उसे ऐसा करना पड़ा था ।

३७६ विनय-पत्रिका [ २२६ ] भरोसो जाहि दूसरो सो करो । मोको तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो ॥१॥ करम उपासन, ग्यान, वेदमत, सो सब भाँति खरो । मोहि तो सावन के अंधहि, ज्यों सूझत रंग हरो ॥२॥ चाटत रह्यो स्वान पातरि ज्यों कवहूँ न पेट भरो । सो हौं सुमिरत नाम सुधारस पेखत परसि धरो ॥३॥ स्वारथ औ परमारथ हू को नहिं कुंजरो-नरो । सुनियत सेतु पयोधि पखाननि करि कपि-कटक तरो ॥४॥ प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी, तहँ ताको काज सरो । मेरे तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो ॥५॥ संकरु साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो । अपनो भलो राम-नामहिं तें तुलसिहि समुझि परो ॥६॥ शब्दार्थ—पेखत = देखता हूँ। परसि = स्पर्श करके । कटक = सेना । सरो = पूरा होता है । अरनि = हठ । भावार्थ—जिसे दूसरा कोई भरोसा हो, वह (और कुछ) करे । मेरे लिए तो इस कलिमें राम-नामरूपी कल्पवृक्ष ही कल्याणका फल फला हुआ है ॥१॥ कर्मकांड, उपासनाकांड, ज्ञानकांड ये त्रिकांड वेद सम्मत हैं और सब प्रकारसे खरे हैं; पर मुझे तो सावनके अन्धेकी भाँति हरियाली ही दिखाई पड़ रही है (अर्थात् चारों ओर राम-नाममें ही भलाई दिखाई पड़ रही है) ॥२॥ पहले मैं कुत्तेकी तरह पत्तल चाटता रहा, कभी पेट न भरा; किन्तु अब वही मैं रामनाम- का स्मरण करते ही अमृत-रस परोसकर रखा हुआ देखता हूँ। भाव यह कि पहले मैंने बहुतसे साधन किये, पर कामना न मिटी; किन्तु राम-नामके प्रभावसे मुझे अमृत-रस अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष परोसा हुआ दिखाई पड़ रहा है, और उसे लेनेकी इच्छा नहीं हो रही है ॥३॥ स्वार्थ और परमार्थ दोनोंकी प्राप्तिके लिए मैं 'नरो कुंजरो' कुछ नहीं कह सकता (अर्थात् दोनों ही मेरे सामने परोसे हुए रखे हैं, पर मैं 'नरो-कुंजरो' कुछ नहीं कहता यानी एकको

भी नहीं चाहता)। सुना है कि नामके ही प्रभावसे बानरी सेना पत्थरोंका पुल बनाकर समुद्र पार कर गयी थी। अर्थात् जिस नामकी इतनी बड़ी महिमा है, उसे छोड़कर मैं स्वार्थ और परमार्थके बखेड़ेमें क्यों पहूँ ? ॥४॥ जहाँ जिसका प्रेम और विश्वास है, वहीं उसका काम पूरा होता है। मेरे माँ-बाप तो राम-नामके दोनों अक्षर ही हैं—इन्हींके आगे मैं बाल-हठसे अड़ा हुआ हूँ ॥५॥ इसमें यदि मैं कुछ छिपाकर कहता होऊँ, तो शिवजी साक्षी हैं मेरी जीभ जल जाय या गल जाय। तुलसीको तो अपना भला राम-नामसे ही समझ पड़ा है ॥६॥

विशेष १—'नहि कुंजरो नरो'—भगवान्ने महाभारत युद्धमें द्रोणाचार्यका बध कराना आवश्यक समझा। अतः भीमसेनने अश्वत्थामा नामके हाथीको मार डाला। द्रोणाचार्यके प्रिय पुत्रका नाम भी अश्वत्थामा था। अश्वत्थामाके मारे जानेका हाल पाकर द्रोणने युधिष्ठिरसे पूछा कि कौन मारा गया है ? उन्होंने सोचा कि युधिष्ठिर झूठ न बोलेंगे। धर्मराजने कहा—'अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा।' अर्थात् अश्वत्थामा मारा गया, मनुष्य या हाथी। उन्होंने 'मनुष्य' तो जोरसे कहा, पर 'हाथी' धीरेसे कहा। प्रिय पुत्रके मरनेका समा- चार सुनकर ज्यों ही द्रोणाचार्य मूर्च्छित-से हुए, त्यों ही धृष्टद्युम्नने उनका मस्तक काट लिया। तभीसे 'नरो-कुंजरो' का प्रयोग बोल-चालमें होने लगा है।

[ २२७ ] नाम, राम रावरोई हित मेरे। स्वारथ परमारथ साथिन्ह सों भुज उठाइ कहौं टेरे ॥१॥ जननी-जनक तज्यो जनमि, करम बिनु बिधिहु सृज्यो अवडेरे। मोहुँसे कोउ कोउ कहत रामहि को, सो प्रसंग केहि केरे ॥२॥ फिऱ्यो ललात बिनु नाम उदर लगि, दुखउ दुखित मोहिं हेरे। नाम-प्रसाद लहत रसाल-फल अब हौं बबुर बहेरे ॥३॥ साधत साधु लोक परलोकहिं, सुनि गुनि जतन घनेरे। तुलसी के अवलम्ब नाम को, एक गाँठि कइ फेरे ॥४॥

३७८ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—टेरे=पुकारकर। अवडेरे=बेढंगा। हेरे=देखकर । रसाल=आम। बहेरे=बहेड़ा । भावार्थ—हे रामजी ! मेरे लिए तो (बस) आपका नाम ही है। यह बात मैं स्वार्थ और परमार्थके साथियोंसे हाथ उठाकर तथा पुकारकर कहता हूँ ॥१॥ माता-पिताने तो मुझे उत्पन्न करते ही त्याग दिया, ब्रह्माने भी मुझे भाग्यहीन और बेढब-सा बनाया। इतनेपर भी मेरे जैसेको कोई-कोई रामजीका ही कहते हैं, सो किसके नातेसे ? ॥२॥ बिना रामनामके मैं पेटके लिए ललाता फिरा; मुझे देखकर दुःख भी दुःखित था। किन्तु अब नामके प्रसादसे मुझे बबूर और बहेड़ेके वृक्षसे आमके फल मिल रहे हैं। अर्थात् मेरे कर्म तो ऐसे हैं कि मैं बहुत कटु फल पाऊँ, पर राम-नामके प्रसादसे मुझे उन नीच कर्मोंका भी अच्छा फल मिल रहा है; या जो संसार पहले मुझे दुःखमय भास रहा था, वही अब सिया-राममय दिखनेके कारण आनन्दमय प्रतीत हो रहा है ॥३॥ साधु लोग सुन और समझकर नाना प्रकारके यत्नोंसे अपना लोक और परलोक साधते हैं; किन्तु तुलसीको तो एक रामनामका ही अवलम्ब है; जैसे एक गाँठ हो और फेरे बहुतसे हों (इसी प्रकार साधन चाहे जितने हों, पर सबका आधार केवल राम-नाम ही है) ॥४॥ विशेष १—'बबुर बहेरे'—श्री बैजनाथजीने इसका यह अर्थ लिखा है—'बबुर बहेराके वृक्ष तें रसाल फल पायो भाव पूर्व पिशाचै सिद्धि द्वारा भक्ति लाभ भई, यह भक्तमालमें प्रसिद्ध है।' [२२८] प्रिय राम-नाम तें जाहि न रामो। ताको भलो कठिन कलिकालहूँ आदि-मध्य-परिनामो ॥१॥ सकुचत समुझि नाम-महिमा मद-लोभ-मोह-कोह-कामो। राम-नाम-जप-निरत सुजन पर करत छाँह घोर घामो ॥२॥ नाम-प्रभाउ सही जो कहै कोउ सिला सरोरुह जामो। सो सुनि सुमिरि भाग-भाजन भइ सुकृतसील भील भामो ॥३॥

विनय-पत्रिका ३७९ बाल्मीकि-अजामिलके कछु हुतो न साधन सामो। उलटे-पलटे नाम-महातम गुंजनि जितो ललामो ॥४॥ राम तें अधिक नाम-करतब, जेहि किये नगर-गत गामो। भये बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदास से वामो ॥५॥ शब्दार्थ—परिनामो = अन्त। सरोरुह = कमल। जामो = जम उठा, उगा। भामो = स्त्री। सामो = सामान। गुंजनि = घुँघचियाँ। ललामो = रत्न, माणिक। भावार्थ—जिसे रामजी भी रामनामकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं हैं, उसका इस कठिन कलिकालमें भी आदि, मध्य और अन्त अच्छा है ॥१॥ नामकी महिमा समझकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद सकुच जाते हैं। राम-नामके जपमें रत रहनेवाले सज्जनोंपर कड़ी धूप भी छाया कर देती है ॥२॥ यदि कोई कहे कि राम-नामके प्रभावसे पत्थरपर कमल उगा है, तो वह भी ठीक है। क्योंकि उसी नामके सुनने और स्मरण करनेसे भीलनी शबरी सुकृतशीला और भाग्यवती हो गयी थी ॥३॥ वाल्मीकि और अजामिलके पास तो साधनका कोई भी सामान नहीं था। किन्तु नामके माहात्म्यसे उलट-पुलटमें ही घुँघचियोंने रत्नको जीत लिया ॥४॥ नामकी प्रभुता श्रीरामजीसे अधिक है, क्योंकि उसने गाँवको शहर बना दिया (अर्थात् मूर्खको चतुर बना दिया); या देहातमें रहनेवाले उजड़े हुएको शहरमें लाकर प्रतिष्ठित कर दिया और जिसे जपकर तुलसीदासके समान विमुख प्राणी भी डंकेकी चोट सम्मुख हो गये ॥५॥ विशेष १—'उलटे पलटे'—यहाँ 'उलटे' शब्द महर्षि वाल्मीकिके लिए और 'पलटे' शब्द अजामिलके लिए लिखा जान पड़ता है। यानी वाल्मीकि तो उलटा नाम जपकर तर गये और अजामिल पुत्रके बहाने 'नारायण' नाम उच्चारण करके मुक्त हो गया। किन्तु उलटे नामकी कथा प्राचीन ग्रन्थोंमें नहीं पायी जाती। संस्कृतके अनुसार 'मरा' शब्दका कुछ अर्थ भी नहीं होता। वैसे 'मरा' शब्द यदि वार-बार कहा जाय तो उसकी ध्वनि 'राम'में बदल जाती है। 'उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भे ब्रह्म समाना।' इसमें कविका यह आशय जान पड़ता है कि 'अहिंसा परमो धर्मः' या जीवोंकी रक्षा करना तो सीधा

३८० विनय-पत्रिका नाम जपनेका सार है और हिंसा करना या बध करना उलटे नामका जप है। अथवा 'उलटे पलटे' का अर्थ अनाप-शनाप भी हो सकता है। २—गुसाईंजीने रामचरितमानसमें नाम और नामीका वर्णन विस्तृत रूप- से किया है :— निर्गुन ते इहि भाँति बड़, नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नाम बड़ राम तें, निज बिचार अनुसार ॥ × × × राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ॥ × × × राम सुकण्ठ विभीषण दोऊ । राखे सरन जान सब कोऊ । नाम अनेक गरीब निवाजे । लोक बेद वर विरद विराजे ॥ राम भालु कपि कटक बटोरा । सेतु हेतु श्रम कीन न थोरा ॥ नाम लेत भव-सिन्धु सुखाहीं । करहु बिचार सुजन मन माहीं ॥ —रामचरितमानस [२२९] गरैगी जीह जो कहौं और को हौं। जानकी-जीवन ! जनम-जनम जग ज्यायो तिहारेहि कौर को हौं ॥१॥ तीनि लोक, तिहुँ काल न देखत सुहृद रावरे जोर को हौं। तुमसों कपट करि कलप-कलप कृमि है हौं नरक घोर को हौं ॥२॥ कहा भयो जो मन मिलि कलिकालहिं कियौ भौंतुआ भौर को हौं। तुलसिदास सीतल नित यहि बल, बड़े ठेकाने ठौर को हौं ॥३॥ शब्दार्थ—गरैगी = गल जायगी। जोरको = जोड़का, बराबरीका । कृमि = कीड़ा । भौंतुआ = जलमें रहनेवाला काले रंगका छोटा कीड़ा। ये कीड़े नौकाओंके पास विशेष रूपसे रहते हैं और बड़े तेज तैराक होते हैं। इन्हें पौड़किया और भौंरा भी कहते हैं। भौर = भँवर । भावार्थ—मेरी जीभ गल जायगी यदि मैं यह कहूँगा कि मैं दूसरेका हूँ । हे जानकी-जीवन ! मैं तो इस संसारमें जन्म-जन्मसे आपहीके कौरेका जिलाया हुआ हूँ ॥१॥ तीनों लोक (आकाश, पाताल, मर्त्य) और तीनों काल-(भूत,

विनय-पत्रिका ३८१ वर्तमान, भविष्य) में मैं आपके जोड़का सुहृद् नहीं देखता । आपके साथ कपट करनेसे मैं कल्प-कल्पान्ततक घोर नरकका कमि होकर रहूँगा ॥२॥ क्या हुआ, यदि कलियुगने मेरे मनसे मिलकर उसे भँवरका भौंतुवा बना दिया ? तुलसीदास इसी बलपर प्रसन्न रहता है कि वह बड़े ठौर-ठिकानेका रहनेवाला है अर्थात् श्रीरामजीके दरबारका सेवक है। कलियुग उसका एक बाल भी बाँका नहीं कर सकता ॥३॥ विशेष १—'तीनि लोक ..... हौं'—वास्तवमें दशरथके लला प्रत्येक बातमें अद्वितीय हैं। जो बातें उनमें हैं, वे तीनों लोकमें दिखाई नहीं पड़तीं । देखिये न, भिखारीदास भी कहते हैं— ब्याल, मृनाल सुडाल कराकृति, भावते जू की भुजान मैं देख्यौ । आरसी सारसी सूर सरसी दुति आनन आनंदखान मैं देख्यौ ॥ मैं मृगमीन मृनालन की छबि 'दास' उन्हीं अँखियान मैं देख्यौ । जो रस ऊख मयूख पियूष मैं सो हरि की बतियान मैं देख्यौ ॥ सारसी = कमलिनी । [ २३० ] अकारन को हितू और को है । बिरद 'गरीब-निवाज' कौन को, भौंह जासु जन जोहैं॥१॥ छोटो बड़ो चहत सब स्वारथ, जो विरंचि बिरचो है । कोल कुटिल, कपि-भालु पालिवो कौन कृपालुहि सोहै ॥२॥ काको नाम अनख आलस कहैं अघ अवगुननि बिछोहै । को तुलसीसे कुसेवक संग्रह्यो, सठ सब दिन साईं द्रोहै ॥३॥ शब्दार्थ—जोहैं=देखे। अनख = क्रोध। अघ = पाप । संग्रह्यो = संग्रह किया है। सठ= दुष्ट । भावार्थ—बिना कारणके हित करनेवाला और कौन है ? गरीबोंको निहाल करनेका बाना किसका है जिसकी भृकुटी यह दास विलोकता रहे ॥१॥ छोटे- बड़े जिन्हें ब्रह्माने बनाया है, वे सब अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं।

कुटिल कोल-भील, बन्दर और रीछ आदिका पालन करना और किस कृपालुको शोभा देता है ? ॥२॥ क्रोध और आलस्यके साथ भी किसका नाम लेनेसे पाप और दुर्गुण दूर हो जाते हैं ? किसने तुलसी-सरीखे बुरे सेवकका संग्रह किया है (अपनाया है), जो दुष्ट सदा अपने स्वामीसे द्रोह किया करता है ? ॥३॥ विशेष १—'चहत सब स्वारथ'—इसपर और भी कहा है :— 'स्वारथके सब ही सगे, बिनु स्वारथ कोउ नाहिं । सेवैं पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ॥' २—'काको······बिछोहै'—यही बात गुसांईजीने रामचरितमानसमें भी कही है— 'भाव कुभाव अनख आलसहू । नाम जपत मंगल दिसि दसहू ॥' ईश्वराराधन किसी भी भावसे क्यों न किया जाय, हर हालतमें वह कल्याणकारी ही होता है । बुरे भावसे साधन करना भी कल्याणप्रद हो जाता है । महाभारतमें एक कथा है जो कि इस प्रकार है—एक मेहतर था जो किसी राजाके यहाँ पाखाना साफ करता था । एक दिन उसकी नजर रानीपर पड़ गयी । परिणाम यह हुआ कि वह रानीको पानेके लिए बीमार पड़ गया । रानी भी उसका भाव ताड़ गयी । कई दिनोंके बाद रानीने मेहतरकी स्त्रीसे पूछा, आजकल तेरा पति क्यों नहीं दिखाई पड़ता ? उसने कहा, बीमार है । रानीने बीमारी- का हाल पूछा और आश्वासन देकर सच बात बतानेके लिए कहा । मेहतरानीने सब हाल कह सुनाया । रानीने कहा, उससे कहो कि वह जंगलमें जाकर खूब साधना करे । जब वह ऐसा अभ्यास करके यहाँ आवे कि महीनों बिना अन्न- जलके एक आसनसे रह सके, तब उसकी ख्याति सुनकर मैं भी उसका दर्शन करने जाऊँगी । उसी समय उससे भेंट हो सकेगी । मेहतर अपनी स्त्रीसे यह समाचार पाकर स्वस्थ हो गया और रानीसे मिलनेकी आशासे तप करनेके लिए जङ्गलमें चला गया । कुछ दिनोंके बाद अभ्यास बढ़ाकर वह राजाकी पुरीमें आया । उसकी अपूर्व साधनाका हाल सुनकर राजा भी उसका दर्शन करने गये और पीछे उन्होंने अपनी रानीको भी उसके पास दर्शनार्थ भेजा । रानीने उसे

विनय-पत्रिका ३८३ देखते ही पहचान लिया । कहा, रे ढोंगी ! अब तो आँखें खोल, मैं तेरे सामने खड़ी हूँ। मेहतरने आँखें खोलकर रानीको देखा। तुरन्त ही उसकी ज्ञान दृष्टि खुल गयी। सोचा, जिस मार्गपर ढोंग रचकर चलनेमें इतनी बड़ी शक्ति है कि राजरानी एक मेहतरका दर्शन करने आयी है, उस मार्गपर सच्चे दिलसे चलनेपर तो न-जाने कौनसा बड़ा फल मिल सकता है। फिर क्या था, उसने रानीको जवाब दे दिया और सच्चे दिलसे ईश्वर-भजन करके मुक्त हो गया। कुभावके साथ ईश्वर-मार्गपर चलनेमें भी कल्याण होनेका यह ज्वलन्त उदा- हरण है। [२३१] और मोहिं को है, काहि कहिहौं ? रंक-राज ज्यों मन को मनोरथ, केहि सुनाइ सुख लहिहौं ॥१॥ जम-जातना, जोनि-संकट सब सहे दुसह अरु सहिहौं । मो को अगम, सुगम तुम को प्रभु, तउ फल चारि न चहिहौं ॥२॥ खेलिबे को खग-मृग, तरु-किंकर ह्वै रावरो नाम हौं रहिहौं । यहि नाते नरकहुँ सचु, या बिनु परम-पदहुँ दुख दहिहौं ॥३॥ इतनी जिय लालसा दासके, कहत पानही गहिहौं । दीजै बचन कि हृदय आनिये 'तुलसीको पन निर्बहिहौं' ॥४॥ शब्दार्थ-सचु = सुख । परम पदहुँ = मोक्ष भी । पानही = पनही, जूता । भावार्थ-मेरे लिए और कौन है, किससे कहूँगा ? मेरा मनोरथ वैसे ही है जैसे गरीबकी राजा बननेकी इच्छा । सो यह मनोरथ किसे सुनाकर परमानन्द प्राप्त करूँगा ? ॥१॥ यम-यातना तथा अनेक योनियोंमें पैदा होनेका सब असह्य दुःख सह चुका हूँ और सहूँगा । किन्तु हे प्रभो ! यद्यपि मेरे लिए अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष इन चारों फलोंकी प्राप्ति दुर्लभ है और आपके लिए इनका दे डालना सहज है—तथापि मैं इन्हें कभी न चाहूँगा ॥२॥ मैं तो आपके खेलनेके लिए पक्षी, मृग, वृक्ष और नौकर होकर आपहीके नामसे रहना चाहता हूँ (अर्थात् मैं कुछ भी क्यों न रहूँ, पर कहाऊँ आपहीका) । इस नातेसे (आपका होकर) रहनेमें मुझे नरकमें भी सुखका अनुभव होगा; किन्तु यदि

३८४ विनय-पत्रिका यह नाता न रहेगा तो मोक्ष-पद प्राप्त करनेपर भी मैं दुःखसे जलता रहूँगा ॥३॥ मैं आपकी जूती पकड़कर (छूकर) कहता हूँ कि इस दासके हृदयमें इतनी ही लालसा है। अब या तो आप यह बचन दे दीजिये, और या इसे अपने हृदयमें रखे रहिये कि 'मैं तुलसीका प्रण पूरा कर दूँगा' ॥४॥ विशेष १—'खेलिबे को......रहिहौं'—इसपर भक्तवर ललितकिशोरीजीकी भी सुन्दर रचना है ! 'जमुना पुलिन कुंज गहवर की, कोकिल ह्वै द्रुम कूक मचाऊँ । पद पंकज प्रिय लाल मधुप ह्वै, मधुरे मधुरे गुंज सुनाऊँ ॥ कूकर ह्वै बन बीथिन डोलों, बचे सीत रसिकन के पाऊँ । ललित किसोरी आस यही, ब्रज-रज तजि छिन अनत न जाऊँ ॥' २—'किंकर'—इसकी जगह कुछ प्रतियोंमें कंकर पाठ भी है। किन्तु अधिकांश प्रतियोंमें 'किंकर' होनेके कारण यही पाठ लिया गया है। 'कंकर' होनेपर कंकड़ अर्थ समझना चाहिये। [२३२] दीनबन्धु दूसरो कहँ पावौं ? को तुम बिनु पर-पीर पाइहै ? केहि दीनता सुनावौं ॥१॥ प्रभु अकृपालु, कृपालु अलायक, जहँ-जहँ चितहिं डोलावौं । रहै समुझि सुनि रहौं मौन ही, कहि भ्रम कहा गवावौं ॥२॥ गोपद बुड़िबे जोग करम करौं बातनि जलधि थहावौं । अति लालची, काम-किंकर मन, मुख रावरो कहावौं ॥३॥ तुलसी प्रभु जिय की जानत सब, अपनौ कछुक जनावौं । सो कीजै, जेहि भाँति छाँड़ि छल द्वार परो गुन गावौं ॥४॥ शब्दार्थ—मौन = चुप। गोपद = गोखुर। थहावों = थाह लगाता हूँ। किंकर = दास। परो = पड़े रहकर। भावार्थ—मैं (आपको छोड़कर) दूसरा दीनबन्धु कहाँ पाऊँगा ? मैं किसे अपनी दीनता सुनाऊँ ? आपके सिवा और कौन दूसरेके दुःखसे दुःखी

विनय-पत्रिका ३८५ होगा ? ॥१॥ मैं जहाँ-जहाँ अपना चित्त दौड़ाता हूँ, सब स्वामी मुझे अकृपालु ही जान पड़ते हैं; और जो लोग कृपालु भी हैं, वे अयोग्य (असमर्थ) हैं। यही सुन और समझकर मैं मौन ही रहता हूँ, क्यों किसीसे कुछ कहकर अपना भरम खोऊँ ॥२॥ काम तो करता हूँ गोखुरके पानीमें (चुल्लूभर पानीमें) डूब मरनेका, और बातोंसे समुद्र थहाता हूँ। मेरा मन तो अत्यन्त लालची और कामुकताका दास है, पर मुखसे आपका (दास) कहलाता हूँ ॥३॥ हे प्रभो ! यद्यपि आप तुलसीके हृदयकी सब बात जानते हैं, तथापि मैं अपना कुछ हाल आपको जनाता हूँ। (मेरी यही लालसा है कि) आप ऐसा कीजिये, जिससे मैं छल छोड़कर आपके द्वारपर पड़ा आपहीके गुण गाता रहूँ ॥४॥ [२३३] मनोरथ मनको एकै भाँति । चाहत मुनि-मन-अगम सुकृत-फल, मनसा अघ न अघांति ॥१॥ करमभूमि कलि जनम, कुसंगति, मति बिमोह-मद-माति । करत कुजोग कोटि, क्यों पैयत परमारथ-पद साँति ॥२॥ सेइ साधु-गुरु, सुनि पुरान-स्रुति बूझ्यो राग बाजी ताँति । तुलसी प्रभु सुभाउ सुरतरु-सो, ज्यों दरपन मुख-काँति ॥३॥ शब्दार्थ - अघाति = तृप्ति । करमभूमि = भारतवर्ष साँति = शान्ति । ताँति = सारंगी । काँति = कान्ति, सौन्दर्य । भावार्थ- मनका मनोरथ भी एक ही तरहका है। मेरा मन ऐसे पुण्यका फल चाहता है जो मुनियोंके मनके लिए दुर्लभ है; किन्तु पाप करनेसे उसकी तृप्ति ही नहीं होती ॥१॥ इस कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म तो हुआ, पर कलियुगमें; कुसंगति, मोह-मदसे मतवाली बुद्धि एवं करोड़ों बुरे कर्म करनेके कारण परमपद और शान्ति कैसे मिल सकती है ? ॥२॥ साधु-महात्माओं तथा गुरुओंकी सेवा करने एवं वेद-पुराण सुननेसे सारंगी बजते ही रागका ज्ञान होनेकी तरह यह मालूम हो गया है कि तुलसीके प्रभु श्रीरामजीका स्वभाव कल्पवृक्षके समान तथा दर्पणमें मुखकी कान्ति या शोभाके सदृश है। भाव यह कि जिस प्रकार शीशेमें वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है जैसा मुँहका आकार रहता है, उसी २५

३८६ विनय-पत्रिका प्रकार भगवान् मनोकामना पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष तो अवश्य हैं, पर कल्पवृक्षके नीचे बैठनेपर मनोभावोंके अनुसार ही फल मिलेगा ॥३॥ [२३४] जनम गयो बादिहिं बर बीति । परमारथ पाले न पर्‍यो कछु, अनुदिन अधिक अनीति ॥१॥ खेलत खात लरिकपन गो चलि, जौबन जुवतिन लियो जीति । रोग-बियोग-सोग-श्रम-संकुल बड़ि बय वृथहि अतीति ॥२॥ राग-रोष-इरिषा-बिमोह-बस रुची न साधु समीति । कहे न सुने गुनगन रघुबर के, भइ न रामपद-प्रीति ॥३॥ हृदय दहत पछिताय-अनल अब, सुनत दुसह भवभीति । तुलसी प्रभु तें होइ सो कीजिय समुझि बिरदकी रीति ॥४॥ शब्दार्थ- बादिहिं = व्यर्थ ही । अनुदिन = प्रतिदिन । संकुल = परिपूर्ण । बय = अवस्था । समीति = समिति, सभा । भावार्थ- ऐसा उत्तम (मनुष्य) जन्म व्यर्थ ही बीत गया । परमार्थ तो कुछ भी पल्ले न पड़ा, उलटा नित्य-प्रति अनीति ही बढ़ती गयी ॥१॥ लड़कपन तो खेलने-खानेमें चला गया और यौवनको युवतियोंने जीत लिया। रोग, वियोग, शोक और परिश्रमसे परिपूर्ण बुढ़ापा भी व्यर्थ ही बीता जा रहा है ॥२॥ राग, क्रोध, ईर्ष्या और अज्ञानके वशीभूत होनेके कारण साधु-सभा नहीं रुची । न तो कभी रामजीकी गुणावली ही कही और सुनी, और न रामजीके चरणोंमें प्रेम ही हुआ ॥३॥ अब दुःसह संसार-भय सुनकर मेरा हृदय पश्चात्तापकी आगसे जल रहा है । अतः हे प्रभो ! इस तुलसीके लिए आप अपने बानेकी रीतिको समझ- कर जो कुछ हो सके, सो कीजिये ॥४॥ विशेष १—'खेलत......अतीति'—इसपर नीचे लिखा श्लोक याद आ जाता है— 'बाल्यं मया केलिकला-कलापकैर्नीतं च नारीनिरतेन यौवनम् । वृद्धोऽधुना किंनु करोति साधनं मुक्तेर्वृथा मे खलु जीवितं गतम् ॥' भगवान् शंकराचार्य भी कहते हैं—

विनय-पत्रिका ३८७ 'बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीरक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥' [२३५] ऐसेहि जनम-समूह सिराने । प्राननाथ रघुनाथ-से प्रभु तजि सेवत चरन बिराने ॥१॥ जे जड़ जीव कुटिल, कायर, खल, केवल कलिमल-साने । सूखत बदन प्रसंसत तिन्ह कहँ, हरि तें अधिक करि माने ॥२॥ सुख हित कोटि उपाय निरन्तर करत न पायँ पिराने । सदा मलीन पन्थके जल ज्यों, कबहुँ न हृदय थिराने ॥३॥ यह दीनता दूर करिबेको अमित जतन उर आने । तुलसी चित-चिन्ता न मिटै बिनु चिन्तामनि पहिचाने ॥४॥ शब्दार्थ—बिराने = दूसरेके। मल = पाप। थिराने = स्थिर, स्वच्छ। अमित = अगणित। भावार्थ—ऐसे ही अनेक जन्म बीत गये। प्राणनाथ श्रीरघुनाथजीके समान स्वामीके चरणोंको छोड़कर दूसरोंके चरणोंकी सेवा करता रहा ॥१॥ जो मूर्ख जीव हैं, कुटिल, कायर, दुष्ट और केवल कलिके पापोंमें लिप्त हैं, उनकी प्रशंसा करते मुँह सूख गया और उन्हींको भगवान्‌से बड़ा माना ॥२॥ सुखके लिए निरन्तर करोड़ों उपाय करते-करते पैर भी नहीं दुखे। मेरा हृदय रास्तेके जलकी तरह सदा मैला ही बना रहा, कभी स्वच्छ न हुआ ॥३॥ यह दीनता दूर करनेके लिए मैंने अगणित उपाय सोचे, किन्तु तुलसीके चित्तकी चिन्ता, बिना चिन्तामणिको पहचाने (ईश्वर-ज्ञान हुए बिना) नहीं मिट सकती ॥४॥ [२३६] जो पै जिय जानकी-नाथ न जाने । तौ सब करम-धरम श्रमदायक ऐसेइ कहत सयाने ॥१॥ जे सुर, सिद्ध, मुनीस, जोगविद वेद-पुरान बखाने । पूजा लेत, देत पलटे सुख हानि-लाभ अनुमाने ॥२॥

३८८ विनय-पत्रिका काको नाम धोखेहू सुमिरत पातकपुंज पराने। बिप्र-बधिक, गज-गीध कोटि खल कौनके पेट समाने ॥३॥ मेरु-से दोष दूरि करि जनके, रेनु-से गुन उर आने । तुलसिदास तेहि सकल आस तजि भजहि न अजहुँ अयाने ॥४॥ शब्दार्थ—सयाने = चतुरोंने, ज्ञानियोंने। बखाने = वर्णन किया है। पराने = भाग गये। विप्र = ब्राह्मण, अजामिल। समाने = घुस गये। अयाने = मूर्ख। भावार्थ—रे जीव ! यदि तूने श्रीजानकीनाथको न जाना, तो तेरे सब कर्म, धर्म केवल परिश्रम ही देनेवाले हैं,—बुद्धिमान लोग ऐसा ही कहते हैं ॥१॥ वेदों और पुराणोंका कथन है कि जितने देवता, सिद्ध, बड़े-बड़े मुनि और योगके मर्मज्ञ हैं, वे सब पूजा लेकर उसके बदलेमें हानि-लाभका अनुमान करके सुख देते हैं, अर्थात् पहले वे पूजा लेते हैं, उसके बाद अपना लाभ देखकर कुछ देते हैं—यों ही नहीं ॥२॥ भला ऐसा कौन है जिसके नामका धोखेसे भी स्मरण करनेसे पाप-समूह भाग गया ? अजामिल, व्याध, गजेन्द्र और गीध (जटायु) आदि करोड़ों दुष्ट किसके पेटमें समा गये ? ॥३॥ जिस प्रभुने अपने भक्तोंके पर्वतके समान दोषोंको दूर करके (भुलाकर), रज-कणके समान गुणपर ध्यान दिया है, ऐ मूर्ख तुलसीदास ! उस स्वामीको तू सब आशा छोड़कर अब भी क्यों नहीं भजता ? ॥४॥ विशेष १—‘जो पै······जाने’—महाकवि केशवदासने भी कहा है कि राम- भक्तिके बिना सबपर धिक्कार है:— धिक मंगन बिन गुनहि, गुनहु धिक सुनत न रीझै । रीझ सु धिक बिन साँच, साँच धिक देत जु खीझै ॥ देबो धिक बिन मौज मौज धिक धरम न भावै । धरम सु धिक बिन दया, दया धिक अरि पहँ आवै ॥ अरिधिक चित्त न सालहीं, चित धिक जहँ न उदार मति । मतिधिक ‘केसव’ ज्ञान बिन, ज्ञानहु धिक बिन हरि भगति ॥

विनय-पत्रिका ३८९ गोस्वाम़ीजीने कवितावलीमें भी लिखा है— कलु कामसे रूप प्रताप दिनेससे सोमसे सील गनेससे माने । हरिचंदसे साँचे बड़े विधिसे मघवासे महीप विषै सुख साने । सुकसे मुनि सारदासे बकता चिर जीवन लोमसतें अधिकाने । तउ ऐसे भये तो कहा तुलसी जो पै राजिवलोचन राम न जाने ॥ २—'बिप'-अजामिल; ५७ पदके 'विशेष'में देखिये । ३—'बधिक'—व्याध, ९४ पदके विशेषमें देखिये । ४--'गज'-८३ पदके विशेषमें देखिये । ५—'गीध' -२१५ पदके विशेषमें देखिये । ६—'मेरुसे•••••आने'— श्रीरामजीके स्वभावका चित्र पृष्ठ संख्या १५२ में देखिये । 'सुनि सीतापत्ति-सीलसुभाउ' । [ २३७ ] काहे न रसना, रामहि गावहि ? निसिदिन पर-अपवाद वृथा कत रटि-रटि राग बढ़ावहि ॥१॥ नरमुख सुन्दर मन्दिर-पावन बसि जनि ताहि लजावहि । ससि समीप रहि त्यागि सुधा कत रविकर-जल कहँ धावहि ॥२॥ काम-कथा कलि-कैरव-चंदिनि, सुनत श्रवन दै भावहि । तिनहि हटकि कहि हरि-कल-कीरति, करन कलंक नसावहि ॥३॥ जातरूप मति, जुगुति रुचिर मनि रचि-रचि हार बनावहि । सरन-सुखद रविकुल-सरोज-रबि राम-नृपहि-पहिरावहि ॥४॥ बाद-विवाद, स्वाद तजि भजि हरि, सरस चरित चित लावहि । तुलसिदास भव तरहि, तिहूँ पुर तू पुनीत जस पावहि ॥५॥ शब्दार्थ—ससि = चन्द्रमा । कैरव = कुमुदिनी । भावहि = भाता है । हटकि = रोककर । करन = कर्ण, कान । जातरूप = सुवर्ण । भावार्थ—जीभ ! तू श्रीरामजीका गुण-गान क्यों नहीं करती ? क्यों रात- दिन दूसरोंकी निन्दा कर-करके व्यर्थ ही राग-द्वेष बढ़ा रही है ? ॥१॥ मनुष्यके मुखरूपी सुन्दर और पवित्र मन्दिरमें रहकर उसे लज्जित न कर । चन्द्रमाके पास

३९० विनय-पत्रिका रहनेपर भी अमृतको छोड़कर मृगजलके लिए क्यों दौड़ रही है ? (यहाँ सद्ग्रंथ ही चन्द्रमा हैं, ईश्वर-गुणानुवाद अमृत है और विषय-वार्ता ही मृगजल है) ॥२॥ काम-कथाएँ कलियुगरूपी कुमुदिनीके (विकसित करनेके) लिए चाँदनीके सदृश हैं, उन्हें कान लगाकर सुनना तुझे खूब भाता है। तू उन्हें (विषय-चर्चाको) रोककर भगवान्‌के सुन्दर यशका वर्णन करके कानोंका कलंक दूर कर ॥३॥ बुद्धिरूपी सुवर्ण और मुक्तिरूपी सुन्दर मणियोंको रच-रचकर हार बना, और उसे शरणागतोंको सुख देनेवाले रविकुल-कमल-दिवाकर महाराज रामचन्द्रजीको पहना ॥४॥ वाद-विवाद और स्वादको छोड़कर ईश्वर-भजन कर तथा उनके सरस चरित्रमें चित्त लगा; ताकि तुलसीदास संसार-सागरसे पार हो जाय और तुझे भी तीनों लोकमें पवित्र यश प्राप्त हो ॥५॥ विशेष १—‘भव तरहिं’—भवसागरसे पार होनेकी ही आकांक्षा सब भक्तोंकी दिखलाई पड़ती है। देखिये महात्मा सूरदास भी कहते हैं— अबके माधव ! मोहि उधारि । मगन हौं भव-अम्बुनिधि मैं कृपासिंधु मुरारि ! ॥ नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग । लिये जात अगाध जल मैं गहे ग्राह-अनंग ॥ मीन इन्द्रिय अतिहि काटत मोट-अघ सिर भार ! पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सेवार ॥ काम-क्रोध-समेत तृष्णा पवन अति झकझोर । नाहिं चितवन देत तिय सुत नाम-नौका-ओर ॥ थक्यो बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुना-मूल । स्याम ! भुज गहि काढ़ि डारहु ‘सूर’ ब्रजके कूल ॥ [ २३८ ] आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै । तौ जनु तनुपर अछत सीस सुधि क्यों कबन्ध ज्यों जूझै ॥१॥

विनय-पत्रिका ३९१ निज अवगुन, गुन राम ! रावरे लखि-सुनि मति-मन रूझै। रहनि-कहनि-समुझनि तुलसीकी को कृपालु बिनु वूझै ॥२॥ शब्दार्थ-अछत = अक्षत, रहते हुए। कबन्ध = धड़, बिना सिरका शरीर, कबन्ध नामक राक्षस। जूझे = लड़े। रूझै = उलझ जाता है। भावार्थ-हे नाथ ! यदि यह सूझे कि इस जीवका हित आपमें (प्रीति करनेमें) है, तो यह जीव शरीरपर सिर रहते तथा सुध रहते, कबन्धकी तरह . क्यों लड़े ? (तात्पर्य यह कि यदि यह जीव ऐसा जानता कि रामके बिना कल्याण नहीं हो सकता तो दंडका भय रहते ऐसा निर्द्वन्द्व कभी न रहता जैसे वीर पुरुषका बिना मस्तकका शरीर सिर कटनेका भय न रहनेके कारण आवेश- में निर्भीक होकर लड़ता है।) ॥१॥ हे रामजी ! अपने दुर्गुण और आपके गुण देख-सुनकर मेरी बुद्धि और मन दोनों ही उलझ जाते हैं। अर्थात् जब अपने दुर्गुणोंको देखता हूँ तो मन मुड़ जाता है, और जब आपके कोमल चित्तका हाल सुनता हूँ, तो चरणारविन्दकी शरण लेनेकी इच्छा हो जाती है। हे कृपालु ! इस तुलसीकी रहन-सहन, कथन और समझको आपके बिना दूसरा कौन समझ सकता है ? ॥२॥ विशेष १-'कबन्ध'-महा बलवान् राक्षस था। इन्द्रके मारनेपर इसका मस्तक पेटमें चला गया था। फिर भी इसने बहुतसे वीरोंको मारा था। इसके सम्बन्धमें लिखा है- कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपणयः । देवीमाहात्म्यम् । और भी लिखा है- नागानामयुतं तुरङ्गनियुतं सार्द्धं रथानां शतं पत्तीनां दशकोटयो निपतिता एकः कबन्धो रणे। तादृक्कोटि कबन्धनर्त्तनविधौ खेलञ्चलत् खे शिर- स्तेषां कोटिनिपातने रघुपतेः कोदण्डघण्टारवः ॥ इति प्राचीनाः ।

३१२ विनय-पत्रिका [ २३१ ] जाको हरि दृढ़ करि अंग करयो। सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद, विद्या-गुननि भरयो ॥१॥ उतपति पाण्डु-सुतनकी करनी सुनि सतपन्थ डर्यो। ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस, सुनि-सुनि लोक तर्यो ॥२॥ जो निज धरम बेद-बोधित सो करत न कछु बिसर्यो। बिनु अवगुन कृकलास कूप मज्जित कर गहि उधर्यो ॥३॥ ब्रह्म-बिसिख ब्रह्माण्ड-दहन-छम गर्भ न नृपति जरयो। अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिंन वध, सो पुनि फेन मर्यो ॥४॥ बिप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं बिगर्‍यो। उनको कियो सहाय बहुत, उर को सन्ताप हर्यो ॥५॥ गनिका अरु कन्दर्पर्ते जग महँ अघ न करत उबर्यो। तिनको चरित पवित्र जानि हरि निज हृदि-भवन धर्यो ॥६॥ केहि आचरन भलो मानें प्रभु सो तौ न जानि पर्यो। तुलसिदास रघुनाथ - कृपाको जोवत पन्थ खर्यो ॥७॥ शब्दार्थ-अंग करयो = अपना लिया। बेद-बोधित = वेद-विहित। कृकलास = गिर- गिट। बिसिख = बाण। छम = (क्षम) समर्थ। कन्दर्पर्ते = (कन्दर्प से) कामदेव से। उबरयो = बचा। खरयो = खड़ा है। भावार्थ- जिसे भगवान्‌ने दृढ़तापूर्वक अपना लिया, वही सुशील, पवित्र, वेदज्ञ हो गया तथा विद्या एवं गुणोंसे परिपूर्ण हो गया ॥१॥ पाण्डु-पुत्रोंकी उत्पत्ति और उनकी करनी सुनकर सन्मार्ग डर गया था; किन्तु (परमात्माकी कृपासे) वे ही पाण्डव त्रैलोक्य-पूज्य हो गये और उनकी पवित्र कीर्ति सुन-सुनकर संसार तर गया ॥२॥ जिस राजा नृगने वेद-विहित अपने धर्मका पालन करनेमें जरा भी भूल नहीं की, वह बिना दोषके ही गिरगिट बनकर कुएँमें जा पड़ा; किन्तु (जब) आपने उसका हाथ पकड़कर उद्धार कर दिया (तब उसका इतिहास अमर हो गया) ॥३॥ समूचे ब्रह्माण्डको भस्म कर डालनेमें समर्थ ब्रह्मास्त्रसे राजा परीक्षित गर्भमें नहीं जले; किन्तु जो अजर, अमर एवं वज्रसे भी न मरनेवाला था, वही

विनय-पत्रिका ३९३ (नमुचि नामक दैत्य देवासुर-संग्राममें) फेनसे मर गया ॥४॥ ब्राह्मण अजा- मिल और इन्द्रसे ऐसी कौनसी बात थी जो नहीं बिगड़ी थी ? (दोनोंने ही घोर पाप किये थे) किन्तु परमात्माने उन दोनोंकी बड़ी सहायता की, उनके हृदयका सन्ताप दूर कर दिया ॥५॥ गणिका और कामदेवसे, संसारमें कोई भी पाप करनेसे नहीं बचा था; किन्तु उनके चरित्रको पवित्र जानकर भगवान्‌ने उन्हें अपने हृदय-मन्दिरमें स्थान दिया ॥६॥ प्रभुजी किस आचरणसे प्रसन्न होते हैं, यह तो नहीं जान पड़ा; किन्तु तुलसीदास श्रीरघुनाथजीके अनुग्रहकी बाट जोहता खड़ा है ॥७॥

विशेष १—'उतपति······डरयो'—पाण्डवोंकी उत्पत्ति भिन्न-भिन्न देवताओंसे हुई थी । जैसे, धर्मराजसे युधिष्ठिरकी, पवनसे भीमकी, इन्द्रसे अर्जुनकी तथा अश्विनीकुमारसे नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति हुई थी । वे जुआ खेलकर सर्वस्व हार गये, यहाँतक कि द्रौपदीको भी दाँवपर रखकर खो बैठे थे; अथवा पाँचों भाइयोंने मिलकर द्रौपदीको भार्या बनाया । यही सब उनकी करनी थी । २—'जो निज······कर गहि उधस्यो'—२१३ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गर्भ न नृपति जस्यो'—अश्वत्थामाने पाण्डवोंका निर्वंश करनेके इरादेसे परीक्षितको गर्भमें ही मार डालनेके लिए ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था । किन्तु कृष्ण भगवान्‌ने चक्र-सुदर्शनके द्वारा गर्भस्थ शिशु परीक्षितकी रक्षा की थी । ४—'फेन मर्यो'—नमुचि दैत्यने तपस्या करके ब्रह्मासे वर प्राप्त किया था कि 'न तो मैं किसी अस्त्र-शस्त्रसे मारा जाऊँ और न शुष्क या आर्द्र पदार्थसे ही मरूँ ।' देवासुर-संग्राममें इसने घोर उपद्रव किया । इन्द्रने क्रुद्ध होकर इसे मारनेके लिए वज्रका प्रयोग किया, पर उससे भी इसका बाल बाँका न हुआ । अन्तमें आकाशवाणी हुई कि 'यह दैत्य अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मर सकता, इसे समुद्रके फेनसे मारो ।' क्योंकि फेन न तो शुष्क है और न आर्द्र । फिर क्या था, नमुचि दैत्य समुद्रके फेनसे ही मारा गया । ५—'बिप्र अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये ।