भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 403

३१२ विनय-पत्रिका [ २३१ ] जाको हरि दृढ़ करि अंग करयो। सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद, विद्या-गुननि भरयो ॥१॥ उतपति पाण्डु-सुतनकी करनी सुनि सतपन्थ डर्यो। ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस, सुनि-सुनि लोक तर्यो ॥२॥ जो निज धरम बेद-बोधित सो करत न कछु बिसर्यो। बिनु अवगुन कृकलास कूप मज्जित कर गहि उधर्यो ॥३॥ ब्रह्म-बिसिख ब्रह्माण्ड-दहन-छम गर्भ न नृपति जरयो। अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिंन वध, सो पुनि फेन मर्यो ॥४॥ बिप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं बिगर्‍यो। उनको कियो सहाय बहुत, उर को सन्ताप हर्यो ॥५॥ गनिका अरु कन्दर्पर्ते जग महँ अघ न करत उबर्यो। तिनको चरित पवित्र जानि हरि निज हृदि-भवन धर्यो ॥६॥ केहि आचरन भलो मानें प्रभु सो तौ न जानि पर्यो। तुलसिदास रघुनाथ - कृपाको जोवत पन्थ खर्यो ॥७॥ शब्दार्थ-अंग करयो = अपना लिया। बेद-बोधित = वेद-विहित। कृकलास = गिर- गिट। बिसिख = बाण। छम = (क्षम) समर्थ। कन्दर्पर्ते = (कन्दर्प से) कामदेव से। उबरयो = बचा। खरयो = खड़ा है। भावार्थ- जिसे भगवान्‌ने दृढ़तापूर्वक अपना लिया, वही सुशील, पवित्र, वेदज्ञ हो गया तथा विद्या एवं गुणोंसे परिपूर्ण हो गया ॥१॥ पाण्डु-पुत्रोंकी उत्पत्ति और उनकी करनी सुनकर सन्मार्ग डर गया था; किन्तु (परमात्माकी कृपासे) वे ही पाण्डव त्रैलोक्य-पूज्य हो गये और उनकी पवित्र कीर्ति सुन-सुनकर संसार तर गया ॥२॥ जिस राजा नृगने वेद-विहित अपने धर्मका पालन करनेमें जरा भी भूल नहीं की, वह बिना दोषके ही गिरगिट बनकर कुएँमें जा पड़ा; किन्तु (जब) आपने उसका हाथ पकड़कर उद्धार कर दिया (तब उसका इतिहास अमर हो गया) ॥३॥ समूचे ब्रह्माण्डको भस्म कर डालनेमें समर्थ ब्रह्मास्त्रसे राजा परीक्षित गर्भमें नहीं जले; किन्तु जो अजर, अमर एवं वज्रसे भी न मरनेवाला था, वही