विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३९१ निज अवगुन, गुन राम ! रावरे लखि-सुनि मति-मन रूझै। रहनि-कहनि-समुझनि तुलसीकी को कृपालु बिनु वूझै ॥२॥ शब्दार्थ-अछत = अक्षत, रहते हुए। कबन्ध = धड़, बिना सिरका शरीर, कबन्ध नामक राक्षस। जूझे = लड़े। रूझै = उलझ जाता है। भावार्थ-हे नाथ ! यदि यह सूझे कि इस जीवका हित आपमें (प्रीति करनेमें) है, तो यह जीव शरीरपर सिर रहते तथा सुध रहते, कबन्धकी तरह . क्यों लड़े ? (तात्पर्य यह कि यदि यह जीव ऐसा जानता कि रामके बिना कल्याण नहीं हो सकता तो दंडका भय रहते ऐसा निर्द्वन्द्व कभी न रहता जैसे वीर पुरुषका बिना मस्तकका शरीर सिर कटनेका भय न रहनेके कारण आवेश- में निर्भीक होकर लड़ता है।) ॥१॥ हे रामजी ! अपने दुर्गुण और आपके गुण देख-सुनकर मेरी बुद्धि और मन दोनों ही उलझ जाते हैं। अर्थात् जब अपने दुर्गुणोंको देखता हूँ तो मन मुड़ जाता है, और जब आपके कोमल चित्तका हाल सुनता हूँ, तो चरणारविन्दकी शरण लेनेकी इच्छा हो जाती है। हे कृपालु ! इस तुलसीकी रहन-सहन, कथन और समझको आपके बिना दूसरा कौन समझ सकता है ? ॥२॥ विशेष १-'कबन्ध'-महा बलवान् राक्षस था। इन्द्रके मारनेपर इसका मस्तक पेटमें चला गया था। फिर भी इसने बहुतसे वीरोंको मारा था। इसके सम्बन्धमें लिखा है- कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपणयः । देवीमाहात्म्यम् । और भी लिखा है- नागानामयुतं तुरङ्गनियुतं सार्द्धं रथानां शतं पत्तीनां दशकोटयो निपतिता एकः कबन्धो रणे। तादृक्कोटि कबन्धनर्त्तनविधौ खेलञ्चलत् खे शिर- स्तेषां कोटिनिपातने रघुपतेः कोदण्डघण्टारवः ॥ इति प्राचीनाः ।