विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९० विनय-पत्रिका रहनेपर भी अमृतको छोड़कर मृगजलके लिए क्यों दौड़ रही है ? (यहाँ सद्ग्रंथ ही चन्द्रमा हैं, ईश्वर-गुणानुवाद अमृत है और विषय-वार्ता ही मृगजल है) ॥२॥ काम-कथाएँ कलियुगरूपी कुमुदिनीके (विकसित करनेके) लिए चाँदनीके सदृश हैं, उन्हें कान लगाकर सुनना तुझे खूब भाता है। तू उन्हें (विषय-चर्चाको) रोककर भगवान्के सुन्दर यशका वर्णन करके कानोंका कलंक दूर कर ॥३॥ बुद्धिरूपी सुवर्ण और मुक्तिरूपी सुन्दर मणियोंको रच-रचकर हार बना, और उसे शरणागतोंको सुख देनेवाले रविकुल-कमल-दिवाकर महाराज रामचन्द्रजीको पहना ॥४॥ वाद-विवाद और स्वादको छोड़कर ईश्वर-भजन कर तथा उनके सरस चरित्रमें चित्त लगा; ताकि तुलसीदास संसार-सागरसे पार हो जाय और तुझे भी तीनों लोकमें पवित्र यश प्राप्त हो ॥५॥ विशेष १—‘भव तरहिं’—भवसागरसे पार होनेकी ही आकांक्षा सब भक्तोंकी दिखलाई पड़ती है। देखिये महात्मा सूरदास भी कहते हैं— अबके माधव ! मोहि उधारि । मगन हौं भव-अम्बुनिधि मैं कृपासिंधु मुरारि ! ॥ नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग । लिये जात अगाध जल मैं गहे ग्राह-अनंग ॥ मीन इन्द्रिय अतिहि काटत मोट-अघ सिर भार ! पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सेवार ॥ काम-क्रोध-समेत तृष्णा पवन अति झकझोर । नाहिं चितवन देत तिय सुत नाम-नौका-ओर ॥ थक्यो बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुना-मूल । स्याम ! भुज गहि काढ़ि डारहु ‘सूर’ ब्रजके कूल ॥ [ २३८ ] आपनो हित रावरे सों जो पै सूझै । तौ जनु तनुपर अछत सीस सुधि क्यों कबन्ध ज्यों जूझै ॥१॥