भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 404

विनय-पत्रिका ३९३ (नमुचि नामक दैत्य देवासुर-संग्राममें) फेनसे मर गया ॥४॥ ब्राह्मण अजा- मिल और इन्द्रसे ऐसी कौनसी बात थी जो नहीं बिगड़ी थी ? (दोनोंने ही घोर पाप किये थे) किन्तु परमात्माने उन दोनोंकी बड़ी सहायता की, उनके हृदयका सन्ताप दूर कर दिया ॥५॥ गणिका और कामदेवसे, संसारमें कोई भी पाप करनेसे नहीं बचा था; किन्तु उनके चरित्रको पवित्र जानकर भगवान्‌ने उन्हें अपने हृदय-मन्दिरमें स्थान दिया ॥६॥ प्रभुजी किस आचरणसे प्रसन्न होते हैं, यह तो नहीं जान पड़ा; किन्तु तुलसीदास श्रीरघुनाथजीके अनुग्रहकी बाट जोहता खड़ा है ॥७॥

विशेष १—'उतपति······डरयो'—पाण्डवोंकी उत्पत्ति भिन्न-भिन्न देवताओंसे हुई थी । जैसे, धर्मराजसे युधिष्ठिरकी, पवनसे भीमकी, इन्द्रसे अर्जुनकी तथा अश्विनीकुमारसे नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति हुई थी । वे जुआ खेलकर सर्वस्व हार गये, यहाँतक कि द्रौपदीको भी दाँवपर रखकर खो बैठे थे; अथवा पाँचों भाइयोंने मिलकर द्रौपदीको भार्या बनाया । यही सब उनकी करनी थी । २—'जो निज······कर गहि उधस्यो'—२१३ पदके विशेषमें देखिये । ३—'गर्भ न नृपति जस्यो'—अश्वत्थामाने पाण्डवोंका निर्वंश करनेके इरादेसे परीक्षितको गर्भमें ही मार डालनेके लिए ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया था । किन्तु कृष्ण भगवान्‌ने चक्र-सुदर्शनके द्वारा गर्भस्थ शिशु परीक्षितकी रक्षा की थी । ४—'फेन मर्यो'—नमुचि दैत्यने तपस्या करके ब्रह्मासे वर प्राप्त किया था कि 'न तो मैं किसी अस्त्र-शस्त्रसे मारा जाऊँ और न शुष्क या आर्द्र पदार्थसे ही मरूँ ।' देवासुर-संग्राममें इसने घोर उपद्रव किया । इन्द्रने क्रुद्ध होकर इसे मारनेके लिए वज्रका प्रयोग किया, पर उससे भी इसका बाल बाँका न हुआ । अन्तमें आकाशवाणी हुई कि 'यह दैत्य अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मर सकता, इसे समुद्रके फेनसे मारो ।' क्योंकि फेन न तो शुष्क है और न आर्द्र । फिर क्या था, नमुचि दैत्य समुद्रके फेनसे ही मारा गया । ५—'बिप्र अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये ।