विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें३९४ विनय-पत्रिका ६—‘सुरपति’—इन्द्रके नाना प्रकारके घोर पापोंकी कथाएँ पुराणोंमें लिखी हुई हैं। यथा—इन्द्रने मदान्ध होकर ऋषि-पत्नी अहल्याके साथ प्रसङ्ग किया था आदि। ७—‘गनिका’—९४ पदके विशेषमें देखिये। ८—‘कन्दर्प’—कृष्णभगवान्के पुत्र प्रद्युम्न कामदेवके अवतार थे। ९—इसी भावका पद सूरदासका भी देखिये:— जाको मनमोहन अङ्ग कस्यो। ताको केस खस्यो नहिं सिर तें, जो जग बैर पर्यो ॥ हिरनकसिपु परिहारि थक्यो प्रहलाद न नेकु डर्यो। अजहूँ तौ उत्तानपाद-सुत राज करत न मर्यो॥ राखी लाज द्रुपद-तनया की कोपित चीर हर्यो। दूरजोधनको मान भंग करि बसन प्रवाह भर्यो ॥ विप्र भक्त नृग अन्धकूप दिप बलि पढ़ि वेद छर्यो। दीनदयालु कृपानिधि की गति कापै कह्यो पर्यो ॥ जा सुरपति कोप्यो ब्रज उपर कहिधौं कछु न सर्यो। राखे ब्रजजन नंदके लाला गिरिधर विरद धर्यो ॥ जाको विरद है गर्व प्रहारी सो कैसे बिसर्यो। सूरदास भगवन्त भजन करि सरन गहे उधर्यो ॥ महात्मा सूरदास। [२४०] सोइ सुकृती, सुचि साँचो जाहि राम! तुम रीझे। गनिका, गीध, बधिक हरिपुर गये, लै करसी प्रयाग कब सीझे ॥१॥ कबहुँ न डिग्यो निगम-मग तें पग, नृग जग जानि जिते दुख पाये। गजधौं कौन दिछित, जाके सुमिरत लै सुनाम बाहन तजि धाये ॥२॥