विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुर-मुनि बिप्र बिहाय बड़े कुल, गोकुल जनम गोपगृह लीन्हो। बायौं दियो विभव कुरुपतिको, भोजन जाइ विदुर-घर कीन्हो ॥३॥ मानत भलहि भलो भगतनि तें, कछुक रीति पारथहि जनाई। तुलसी सहज सनेह राम बस, और सबै जलकी चिकनाई ॥४॥ शब्दार्थ—निगम = वेद। दिक्षित = दीक्षित। सुनाभ = चक्र। कुरुपति = दुर्योधन। पारथहि = अर्जुनको। भावार्थ—हे रामजी ! जिसपर आप रीझ गये, वही सच्चा पुण्यात्मा और पवित्र है। गणिका, गीध और व्याध जो वैकुण्ठमें गये, वे कब प्रयागमें कण्डेकी (आग) से सीझे थे ? (अर्थात् उन लोगोंने कब तीर्थराज प्रयागमें कल्पवास किया था ?) ॥१॥ राजा नृगका पैर वेद-मार्गसे कभी नहीं डिगा था; किन्तु उन्हें जितना कष्ट भोगना पड़ा, उसे संसार जानता है। गजेन्द्र ही कौनसा दीक्षित हुआ था जिसके स्मरण करते ही आप गरुड़की सवारी छोड़कर (पैदल ही) चक्र सुदर्शन लेकर दौड़े थे ? ॥२॥ देवता, मुनि, ब्राह्मण आदि उच्च कुलोंको छोड़कर आपने गोकुलमें एक गोपके घरमें जन्म लिया। आपने महाराज दुर्योधनके वैभवको ठुकराकर विदुरके घर जाकर भोजन किया ॥३॥ आप अपने अनन्य भक्तोंकी भलाई करना ही अच्छा समझते हैं, आपने यह रीति कुछ-कुछ अर्जुनको बतायी थी। तुलसीदास कहते हैं कि श्रीरामजी स्वाभाविक स्नेहके अधीन हैं और सब साधन जलकी चिकनाईके समान हैं। भाव यह है कि पानी पड़ते ही थोड़ी देरके लिए तो शरीर चिकना हो जाता है, पर कुछ ही देरमें पानी सूख जानेके बाद रूखा हो जाता है। इसी प्रकार अन्य साधनों द्वारा क्षणिक सुख- शान्ति मिलती है, किन्तु जरा भी कामना-रूपी हवाके लगते ही वह सुख-शान्ति हवा हो जाती है ॥४॥ विशेष १—'गनिका'—९४ पदके विशेषमें देखिये।