भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 407

३९६ विनय-पत्रिका २—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ३—'बधिक'—व्याध; ९४ पदके विशेषमें देखिये। ४—'करसी'—कुछ प्रतियोंमें 'कासी' पाठ भी है। यह होनेसे इस प्रकार अर्थ होगा—गणिका, गिद्ध, व्याधको बैकुण्ठमें तो ले गये, पर इन लोगोंने काशी और प्रयागमें कब तपस्या की थी ? ५—'नृग'—२१३ पदके विशेषमें देखिये। ६—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। इसी चरणके आशयका एक पद यह भी है— हे गोविन्द राखु सरन अब तो जीवन हारे। नीर पिवन हेतु गयो सिन्धुके किनारे॥ सिन्धु बीच बसत ग्राह चरन गहि पछारे। लड़त लड़त साँझ भई ले गयो मँझधारे॥ नासिका लौं बूडन लाग्यो कृष्णको पुकारे। द्वारिकामें शब्द भयो गरुड़ छोड़ि धाये॥ ग्राहको तो मारिकै गजराजको उबारे। सूरश्याम मगन भये नन्दके दुलारे॥ मेरो तेरो न्याय होय धर्मराजके दुआरे। ७—'बायौँ.....कीन्हो'—एक बार अभिमानी दुर्योधनने भगवान्‌को आमन्त्रित किया। अन्तर्यामी कृष्णजी उसका कपट-भाव जानकर उसके यहाँ नहीं गये बल्कि विदुरके घर गये। उन्होंने विदुरकी स्त्रीसे भोजन माँगा। विदुर- की स्त्री थोड़ा साग, कुछ केले ले आयी और प्रेमानन्दमें विभोर हो जानेके कारण केलेके छिलके उतारकर भगवान्‌को देने लगी तथा खानेवाला पदार्थ गूदा ज़मीनपर फेंकने लगी। भगवान् बड़े प्रेमके साथ उन छिलकोंको खाने लगे। उसी समय विदुर भी वहाँ आ गये। उन्होंने अपनी स्त्रीका कार्य देखकर बड़ा क्रोध किया और उसका हाथ पकड़कर वहाँसे उठा दिया। पश्चात् उन्होंने अपने हाथसे एक केला छीलकर सार पदार्थ भगवान्‌को दिया। भावके भूखे