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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 408, कुल 475 में से

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पृष्ठ 408

भगवान्ने उसे खाकर कहा, जो माधुर्य उन छिलकोंमें था, वह इसमें नहीं है; अतः मैं न खाऊँगा। इसी भावपर सूरदासजीने भी लिखा है— 'दुर्योधन-घर मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर खायो'

२४१ ] तब तुम मोहूँसे सठनि कौ हठि गति न देते' । कैसेहु नाम लेइ कोउ पामर, सुनि सादर आगे है लेते ॥१॥ पाप-खानि जिय जानि अजामिल, जमगन तमकि तये ताको भेते । लियो छुड़ाइ, चले कर माँजत, पीसत दाँत गये रिस-रेते ॥२॥ गौतम-तिय, गज, गीध, विटप, कपि, हैं नाथहिं नीके मालुम जेते । तिन्ह-तिन्ह काजनि साधु-सभा २ तजि कृपासिंधु तब-तब उठिगे ते।३। अजहुँ अधिक आदर येहि द्वारे, पतित पुनीत होत नहिं केते । मेरे पासंगहु न पूजिहैं, है गये, हैं, होने खल जेते ॥४॥ हौं अब लौं करतूति तिहारिय चितवत हुतो न रावरे चेतै । अब तुलसी पतरौ बाँधिहै, सहि न जात मोपै परिहास एते ॥५॥

शब्दार्थ—पामर = पापी । तमकि = तमककर । तये = लाल हो उठे । रिस-रेते = क्रोधसे भरे हुए, क्रोधित । उठिगे ते = उठकर गये थे । हुतो = था । चेते = ध्यान दिया ।

भावार्थ—तब आप मुझ जैसे दुष्टोंको जबरदस्ती मोक्ष न देते । कोई पापी किसी प्रकार भी आपका नाम क्यों न ले, सुनते ही आप आदरके साथ उसे आगे होकर (बढ़कर) लेते हैं ॥१॥ यमराजके दूतोंने अपने जीमें अजामिलको पापोंकी खानि समझकर उसे डाँटा-फटकारा और (क्रोधसे) लाल हो उठे; किन्तु आपने उसे (उनके हाथसे) छुड़ा लिया । (वे यमदूत बेचारे) क्रोधित होकर हाथ मलते हुए और दाँत पीसते हुए चले गये ॥२॥ गौतमको स्त्री (अहिल्या), गजेन्द्र, गीध (जटायु), वृक्ष (यमलार्जुन), बन्दर तथा इस प्रकारके जो जो आपको प्रिय हैं, उन्हें (सब लोग) जानते हैं। उन सबका जब-जब काम पड़ा था, तब-तब आप साधुसमाजको छोड़कर उठकर चले गये थे ॥३॥ इस दरवाजे-

१. पाठान्तर 'तौ तुम मोहूसे सठनिको हठि गति देते ।' २. 'तिन्हके काज साधु-समाज ।'

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