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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 409

३१८ विनय-पत्रिका पर अब भी पापियोंका आदर है। (मैं आपसे पूछता हूँ कि) यहाँ कितने पापी पवित्र नहीं होते ? किन्तु संसारमें जितने खल या पापी हो चुके हैं, हैं, और होंगे, वे सब मेरे पासंगमें भी नहीं पूजेंगे ॥४॥ अबतक मैं आपकी करतूत देख रहा था (कि देखूँ आप मुझे कब शरणमें लेते हैं), पर आपने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। इसलिए अब यह तुलसीदास (आपके नामका) पुतला बाँधेगा; क्योंकि मुझसे इतनी हँसी सहन नहीं हो सकती ॥५॥ विशेष १—इस पदमें गोस्वामीके रूठनेका बड़ा ही सुन्दर चित्र है। प्रारम्भमें जो 'तब' शब्द आया है, वह बड़ा ही अपूर्व है। कविका आशय यह है कि यदि आपको मुझे तारना स्वीकार नहीं था, तो फिर मेरे समान अन्यान्य दुष्टोंको भी न तारे होते। इसमें कविने रूठकर भगवान्‌को उलाहना दिया है। यहाँ 'तब' शब्द काल-वाचक नहीं है। कविने इस 'तब'का मेल 'अब'के साथ मिलाया है; 'अब तुलसी पूतरो बाँधिहै।' खूब ! इस पदमें रूठनेका भाव है, उलाहना है, स्वामीकी दयालुता है और अन्तमें है धमकी। इस पदको मननपूर्वक पढ़नेसे ही पाठकगण इसका ठीक-ठीक रसास्वादन कर सकेंगे। २—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये। ३—'गौतम-तिय'—४३ पदके विशेषमें देखिये। ४—'गज'—८३ पदके विशेषमें देखिये। ५—'गीध'—२१५ पदके विशेषमें देखिये। ६—'बिटप', यमलार्जुन;—७८ पदके विशेषमें देखिये। ७—'हौं अब लौं करतूति तिहारिय'—इस पंक्तिमें कविका स्वाभिमान-पूर्ण कथन है। वास्तवमें भक्तको सब-कुछ कहनेका अधिकार है। देखिये न, एक कविने तो यहाँतक कह डाला है— तुम करतार जगरच्छाके करनहार पूरत मनोरथ हौ सब चित चाहे के। यह जिय जानि 'सेनापति' हू सरन आयो हूजिये दयालु ताप मेटो दुख दाहे के ॥ जो यौं कहौ तेरे हैं रे करम अनैंसे हम गाहक हैं सुकृति भगति रस लाहे के। आपने करम करि उतरौंगो पार तौ पै हम करतार करतार तुम काहे के ? ॥