भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 410

विनय-पत्रिका ३९९ ८—'पूतरो बाँधिहै'—खेल दिखानेके बाद नट कपड़ेका बनाया हुआ पुतला बाँसपर लटकाकर चारों ओर घुमाता है और कहता फिरता है कि देखो यह सूम है। इससे पैसा न देनेवाले सूम उसे कुछ-न-कुछ दे देते हैं। इसी प्रकार मैं भी पुतला बाँधकर कहता फिरूँगा कि यह सूमराज रामचन्द्रजी हैं। [ २४२ ] तुम सम दीनबंधु, न दीन कोउ मो सम, सुनहु नृपति रघुराई। मो सम कुटिल-मौलिमनि नहिं जग, तुम सम हरि ! न हरन कुटिलाई ॥१॥ हौं मन बचन-करम पातक-रत, तुम कृपालु पतितन-गति दाई। हौं अनाथ, प्रभु ! तुम अनाथ-हित, चित यहि सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥२॥ हौं आरत, आरति-नासक तुम, कीरति निगम-पुराननि गाई। हौं सभीत तुम हरन सकल भय, कारन कवन कृपा बिसराई ॥३॥ तुम सुखधाम राम श्रम-भंजन, हौं अति दुखित त्रिबिध श्रम पाई। यह जिय जानि दास तुलसी कहँ, राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥४॥ शब्दार्थ—मौलिमनि = शिरोमणि । सुरभि = सुध । आरति = दुःख । स्रम = श्रम, त्रिविध श्रम, दैहिक, दैविक और भौतिक । भावार्थ—हे रामजी, सुनिये ! आपके समान दीनबन्धु और मेरे समान दीन दूसरा कोई नहीं है। हे प्रभो ! न तो संसारमें मेरे समान कोई दुष्ट-शिरोमणि है, और न आपके समान कोई दुष्टताका हरण करनेवाला है ॥१॥ मैं मन, वचन और कर्मसे पाप-रत हूँ, और आप कृपालु हैं, पापियोंको सद्गति देनेवाले