विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० विनय-पत्रिका हैं। हे प्रभो ! मेरे चित्तसे इस बातका ध्यान कभी नहीं जा सकता कि मैं अनाथ हूँ और आप अनाथोंका हित करनेवाले हैं ॥२॥ मैं दुखी हूँ, और आप दुःख- भंजन हैं। आपका यह यश वेदों और पुराणोंने गाया है। मैं भयभीत हूँ, और आप सब भयको हरनेवाले हैं। फिर क्या कारण है कि आप मुझपर कृपा करना भूल गये हैं ? ॥३॥ हे रामजी ! आप आनन्द-राशि तथा श्रमके नाश करनेवाले हैं, और मैं दुःखित हूँ तथा तीनों प्रकारका दैहिक, दैविक, भौतिक श्रम पा चुका हूँ। तात्पर्य यह कि आप सुख-धाम हैं, और मैं दुःखित हूँ—अतः मुझे सुख दीजिये। आप श्रम-भंजन हैं और मैं दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों प्रकारके श्रमसे श्रमित हूँ—अतः मेरा श्रम दूर कीजिये। यह सब अपने दिलमें विचारकर तथा अपनी प्रभुताको समझकर इस तुलसीदासको अपनी शरणमें रख लीजिये ॥४॥ [ २४३ ] इहै जानि चरनन्हि चित लायो। नाहिन नाथ ! अकारन को हितु, तुम समान पुरान-श्रुति गायो ॥१॥ जननि-जनक, सुत-दार, बंधु जन, भये बहुत जहँ-जहँ हौं जायो। सब स्वारथहित प्रीति, कपट चित, काहू नहिं हरि भजन सिखायो ॥२॥ सुर-मुनि, मनुज-दनुज अहि-किन्नर, मैं तनु धरि सिर काहि न नायो। जरत फिरत त्रय ताप पाप बस, काहु न हरि ! करि कृपा जुड़ायो ॥३॥ जतन अनेक किये सुख-कारन, हरिपद-विमुख सदा दुख पायो। अब थाक्यो जलहीन नाव ज्यों, देखत बिपति-जाल जग छायो ॥४॥