विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमों कहँ नाथ ! बूझिये, यह गति, सुख-निधान निज पति बिसरायो । अब तजि रोष करहु करुना हरि ! तुलसिदास सरनागत आयो ॥५॥ शब्दार्थ—जनक = पिता । सुत = पुत्र । दार = स्त्री । अहि = सर्प । जुड़ायो = ठण्डा किया; शीतल किया । बूझिये = खबर लीजिये । भावार्थ—हे नाथ ! यही समझकर मैंने आपके चरणोंमें चित्त लगाया कि वेदों और पुराणोंके कथनानुसार आपके समान अकारण ही हित करनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥१॥ मैं जहाँ-जहाँ पैदा हुआ, (सब मिलाकर) मेरे बहुतसे पिता, माता, पुत्र, स्त्री, भाई और स्वजन हुए; किन्तु सबका प्रेम स्वार्थवश था और सभी कपटी हृदयके थे; क्योंकि किसीने भी मुझे भगवद्भजन करनेका उप- देश नहीं दिया ॥२॥ मैंने शरीर धारण करके देवता, मुनि, मनुष्य, राक्षस, सर्प, किन्नर आदि किसके आगे सिर नहीं झुकाया ? हे हरे ! मैं अपने पापोंके कारण तीनों पापोंसे जलता फिरा, पर किसीने भी कृपा करके मुझे शीतल नहीं किया ॥३॥ सुखके लिए मैंने अनेक यत्न किये, किन्तु भगवच्चरणारविन्दोंसे विमुख रहनेके कारण मुझे सदैव दुःख ही मिला। संसारमें विपत्तियोंका जाल छाया हुआ देखकर अब मैं (समस्त साधनोंसे) उसी प्रकार थक गया हूँ जैसे पानीमें न रहनेके कारण नौका (अचल हो जाती है) ॥४॥ हे नाथ ! मेरी खबर लीजिये। मैंने अपने आनन्द-निधान स्वामीको भुला दिया, इसीसे मेरी यह दशा हो रही है। हे प्रभो ! अब आप क्रोधको छोड़कर शरणागत तुलसीदास- पर दया कीजिये; क्योंकि (अब तो) यह दास आपकी शरणमें आ गया ॥५॥ [ २४४ ] याहि ते मैं हरि ग्यान गँवायो । परिहरि हृदय-कमल रघुनाथहि, बाहर फिरत विकल भयो धायो ॥१। ज्यों कुरंग निज अंग रुचिर मद अति मतिहीन मरम नहिं पायो । खोजत गिरि, तरु, लता, भूमि, बिल परम सुगंध कहाँ तें आयो ॥२॥ २६