भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 413

४०२ विनय-पत्रिका ज्यों सर विमल बारि परिपूरन, ऊपर कछु सिवार तृन छायो। जारत हियो ताहि तजि हौं सठ, चाहत यहि बिधि तृषा बुझायो ॥३॥ ब्यापत त्रिविध ताप तनु दारुन, तापर दुसह दरिद्र सतायो । अपनेहि धाम नाम-सुरतरु तजि विषय-बबूर-बाग मन लायो ॥४॥ तुम-सम ग्यान-निधान, मोहिं सम मूढ़ न आन पुराननि गायो । तुलसिदास प्रभु ! यह विचारि जिय कीजै नाथ उचित मन भायो ॥५॥ शब्दार्थ—कुरंग = हरिन । मद = यहाँ 'मद' शब्द कस्तूरीके लिए आया है । मरम = भेद, हाल । वारि = जल । भावार्थ—हे हरे ! मैं इसीलिए ज्ञानसे हाथ धो बैठा कि अपने हृदय-कमल- में स्थित रघुनाथजीको छोड़कर व्याकुल हुआ बाहर-बाहर दौड़ता फिरा ॥१॥ (किस प्रकार दौड़ता फिरा ?) जैसे अत्यन्त बुद्धिहीन मृग अपने अंगके सुन्दर मद-(कस्तूरी) का मर्म नहीं समझ पाता और पर्वत, वृक्ष, लता, पृथिवी, बिल आदिमें ढूँढ़ता फिरता है कि इतनी अधिक सुगन्ध कहाँसे आ रही है ॥२॥ (अथवा) जैसे निर्मल जलसे परिपूर्ण तालाबमें (पानीके) ऊपर सिवार और तृण छाया हुआ है (किन्तु न जाननेके कारण) उस तालाबके स्वच्छ जलको छोड़कर मैं दुष्ट अपना हृदय जला रहा हूँ और इस प्रकार अपनी प्यास बुझाना चाहता हूँ । (भाव यह कि हृदय-सरोवरमें परमात्मारूपी निर्मल जल भरा हुआ है, परन्तु अज्ञानका पर्दा पड़ा रहनेके कारण मैं आत्मानन्दसे प्यास न बुझाकर मृगजलरूपी सांसारिक भोगोंसे तृष्णाको मिटाना चाहता हूँ; परिणाम यह हो रहा है कि त्रितापसे जल रहा हूँ) ॥३॥ एक तो शरीरमें असह्य त्रिविध ताप व्याप रहे हैं, तिसपर दुस्सह दरिद्रता सता रही है। मैं अपने घरमें (शरीरमें स्थित) राम- नामरूपी कल्पवृक्षको छोड़कर विषयरूपी बबूरके बागमें मन लगा रहा हूँ ॥४॥ आपके समान ज्ञानका भण्डार और मेरे समान मूढ़ दूसरा कोई नहीं है, यह बात पुराणोंने कही है। अतः हे तुलसीदासके प्रभु रामजी ! इसपर आप अपने हृदयमें विचार करके जो अच्छा लगे, वही कीजिये ॥५॥ विशेष १—'ज्यों कुरङ्ग......आयो'—जब हरिनके अण्डकोषमें कस्तूरी पैदा हो