विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४०३ जाती है, तो उसकी सुगन्ध बहुत दूरतक उड़ने लगती है। किन्तु उस हरिन- को यह बात नहीं मालूम होती कि सुगन्ध उसीके शरीरसे निकल रही है। परिणाम यह होता है कि वह हरिन उस सुगन्धकी तलाशमें चारों ओर दौड़ता फिरता है। [ २४५ ] मोहिं मूढ़ मन बहुत बिगोयो। याके लिये सुनहु करुनामय, मैं जग जनमि-जनमि दुख रोयो ॥१॥ सीतल मधुर पियूष सहज सुख निकटहिं रहत दूरि जनु खोयो। बहु भाँतिन श्रम करत मोह बस, बृथहि मंदमति वारि विलोयो ॥२॥ करम-कीच जिय जानि, सानि चित, चाहत कुटिल मलहि मल धोयो। तृषावंत सुरसरि विहाय सठ, फिरि-फिरि विकल अकास निचोयो ॥३॥ तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब, मैं निज दोष कछू नहिं गोयो। डासत ही गइ बीति निसा सब, कवहूँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥ शब्दार्थ—विगोयो = बिगाड़ा, सत्यानाश किया। पियूष = अमृत। सहज सुख = परमानन्द। बिलोयो = मंथन किया। निचोयो = निचोड़ना, दुहना। डासत = बिछौना बिछाते। भावार्थ—इस मूर्ख मनने मुझे खूब सत्यानाश किया। हे करुणामय ! सुनिये, इसके लिए मैं संसारमें जन्म ले-लेकर दुःखड़ा रोता रहा ॥१॥ शीतल और मधुर अमृतवत् परमानन्दके निकट रहते हुए भी मैंने मानो उसे बहुत दूर खो दिया। मोहवश नाना प्रकारका श्रम करके व्यर्थ ही मुझ मूढ़ बुद्धिने जल- मंथन किया (विषयरूपी जलको मथकर परमानन्दरूपी घी निकालना चाहा)